खंडवा में भूखे किसान ने कलेक्टर को ‘बिकाऊ’ कहा, SDM ने जेल में बंद करवा दिया

Updesh Awasthee
खंडवा, 6 MAY 2026
: हाल ही में एक हाईकोर्ट ने कहा था कि अधिकारियों को शब्दों पर नहीं समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए लेकिन खंडवा के कलेक्टर खुद को लाट साहब समझते हैं। हाई कोर्ट से केस जीतने के बाद भी 3 साल से अपने खेत में खेती नहीं कर पाने के कारण तड़प रहे किसान ने गुस्से में आकर अधिकारियों को ‘बिकाऊ’ क्या कह दिया, कलेक्टर को इतना बुरा लगा कि उन्होंने SDM को बुलाकर पीड़ित किसान को ही जेल भिजवा दिया। बाद में जब कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मोर्चाबंदी की तब कहीं जाकर किसान और उसके बेटे को जमानत दी गई। 

MP News: Farmer Held in Khandwa Over ‘Bikaau’ Remark Against Collector

यह मामला खंडवा जिले के छैगांवमाखन क्षेत्र के ग्राम बरूड़ निवासी किसान रामनारायण कुमरावत का है। उनके खेत तक जाने का जो रास्ता था, उस पर दूसरे ने कब्जा कर लिया। 2019 से लेकर 2023 तक श्री राम नारायण ने कोर्ट केस लड़ा। तहसील कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक मामला गया। हाई कोर्ट ने किसान के पक्ष में आदेश दिया लेकिन खंडवा जिला प्रशासन ने हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया। किसान के खेत तक जाने वाला रास्ता नहीं खुलवाया। बस इतनी सी बात है। किसान 3 साल से कलेक्टर कार्यालय के चक्कर लगा रहा है। मंगलवार 6 मई को किसान रामनारायण कुमरावत अपने बेटे श्याम कुमरावत के साथ एक बार फिर जनसुनवाई में पहुंचा। पहले कई बार आश्वासन मिल चुका था। वह चाहता था कि इस बार कलेक्टर ऋषव गुप्ता की तरफ से तत्काल कार्रवाई का आदेश जारी हो जाए। हाई कोर्ट के आदेश का पालन हो जाए, लेकिन इस बार भी कलेक्टर ने आश्वासन दे दिया। श्री राम नारायण ने बताया कि वह 3 साल से अपने खेत में खेती नहीं कर पा रहा है, क्योंकि खेत तक जाने का रास्ता बंद है। फिर भी जब किसी ने उसकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया तो उसका धैर्य टूट गया। उसने अधिकारियों की ओर मुंह करते हुए कहा, “तुम सब बिकाऊ हो, समस्या नहीं सुलझाई तो मैं मर जाऊंगा।”

कलेक्टर को इस बयान में किसान का दर्द समझ में नहीं आया बल्कि "तुम सब बिकाऊ हो" सुनने के बाद शायद कलेक्टर का क्लाइमेट चेंज हो गया। उनके इशारे पर सुरक्षाकर्मियों ने हस्तक्षेप किया और पिता-पुत्र को बाहर कर दिया। यहां तक भी ठीक था लेकिन जैसे ही कलेक्टर को पता चला कि, बाहर निकाला गया किसान पत्रकारों से बात कर रहा है। अपना मामला बता रहा है तो तत्काल कलेक्टर के अधीनस्थ SDM को सूचना दी गई। सूचना मिलने पर SDM बजरंग बहादुर मौके पर पहुंचे और दोनों को हिरासत में लेने के निर्देश दिए। कोतवाली पुलिस ने पिता-पुत्र को कस्टडी में लेकर मजिस्ट्रेट के चैंबर में बैठाया। इसके बाद 2 बजे जेल भेज दिया। दोनों पर शांतिभंग की धाराओं में केस दर्ज किया गया।

SDM जमानत देने को तैयार नहीं

घटना के बाद शहर कांग्रेस के पदाधिकारी SDM के पास पहुंचे और जमानत की मांग की। उनका कहना था कि वे मुचलका देने को तैयार हैं। इस दौरान सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा, “अभी जमानत नहीं दूंगा, जेल के दरवाजे बंद हो गए हैं। कल ऑफिस समय में आना, जमानत दे देंगे।” इस पर कांग्रेस नेताओं ने आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि जानबूझकर जमानत में देरी की जा रही है। इसके विरोध में कांग्रेस ने कलेक्टर कार्यालय परिसर में धरना शुरू कर दिया।

जीतू पटवारी ने कलेक्टर को फोन लगाया तब जाकर जमानत हुई

धरने के बीच मामला राजनीतिक स्तर तक पहुंच गया। शहर कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा रघुवंशी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी को फोन कर जानकारी दी। इसके बाद पटवारी ने कलेक्टर से बात की। रात 8:35 बजे SDM कलेक्ट्रेट पहुंचे और कांग्रेस के आवेदन पर किसान पिता-पुत्र को जमानत दे दी। मौके पर पुलिस बल तैनात कर स्थिति पर नजर रखी गई।

SDM बजरंग बहादुर का बयान

सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर का कहना है कि पिता-पुत्र जनसुनवाई में लगातार हंगामा कर रहे थे और अधिकारियों से मारपीट की स्थिति बना रहे थे। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी थी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सख्ती नहीं बरती जाए, तो जनसुनवाई व्यवस्था प्रभावित होगी और कोई भी अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार कर सकता है।

किसान रामनारायण का बयान

किसान का कहना है कि उसकी जमीन से जुड़े रास्ते का विवाद लंबे समय से चल रहा है। 1981 की रजिस्ट्री में रास्ता दर्ज होने के बावजूद 2019 में पड़ोसियों ने रास्ता बंद कर दिया। उसके अनुसार, उसने तहसील और एसडीएम कोर्ट में मामला जीता, यहां तक कि उच्च न्यायालय से भी राहत मिली, लेकिन स्थानीय स्तर पर आदेश का पालन नहीं हुआ। किसान का आरोप है कि उसने कई बार जनसुनवाई में आवेदन दिए, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। रास्ता बंद होने के कारण उसकी जमीन पिछले तीन साल से खाली पड़ी है, जिससे उसे आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसी लगातार परेशानी और निराशा के चलते जनसुनवाई में उसका आक्रोश खुलकर सामने आया। 

शब्दों पर नहीं समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए

मध्य प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों में तानाशाही का रवैया देखने को मिलने लगा है। संभव है मौसम का असर हो लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को ट्रेनिंग में यही सिखाया जाता है। चौराहे पर खड़े पुलिस कर्मचारी और कलेक्टर में यही अंतर होता है। यदि ऐसी कोई समस्या किसी जन समूह की होती तो अब तक चक्काजाम हो गया होता है। यदि किसान ने सभ्यता की मर्यादा तोड़ दी तो उसके पीछे उसका जीवन यापन का संकट था। सिक्योरिटी को बुलाकर बाहर निकाल देना काफी था। लोकल के विधायक और जनप्रतिनिधियों को भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार की घटनाओं का दुष्परिणाम सरकार को भुगतना पड़ता है।
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