MP हाई कोर्ट ने रामायण और महाभारत का उदाहरण दे विदेशी बच्चों को वापस भेजने से इनकार किया

Updesh Awasthee
इंदौर, 20 अप्रैल 2026
: भारतीय न्याय व्यवस्था में यह एक महत्वपूर्ण मामला है। जिसका उल्लेख आने वाले कई मामलों में किया जाएगा। यह मामला संतान की कस्टडी से जुड़ा हुआ है लेकिन संतान का जन्म विदेश (कनाडा और अमेरिका) में हुआ है। इस कारण वह विदेशी नागरिक हैं। इसके बाद भी हाईकोर्ट ने उनको विदेश भेजने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने निर्णय तक पहुंचने में रामायण और महाभारत का उदाहरण दिया और बताया कि, बच्चे का अधिकार केवल एक कानूनी ढांचा नहीं बल्कि एक Civilizational Norm है। 

मामला 1: सौरव मलपानी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (रिट पिटीशन नंबर 22416/2024)

यह मामला सौरव मलपानी (पिता) और उनकी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 4) के बीच अपनी नाबालिग बेटी मिराया की कस्टडी को लेकर था। 2014 में शादी के बाद यह जोड़ा अमेरिका के शिकागो और फिर कनाडा के टोरंटो में बस गया था। मिराया का जन्म 2016 में शिकागो में हुआ था और वह जन्म से अमेरिकी नागरिक है। अप्रैल 2022 में, मां मिराया को लेकर भारत आई और वापस कनाडा जाने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसने इंदौर में तलाक और कस्टडी के लिए मामला दायर किया। इस बीच, कनाडा की ओंटारियो सुपीरियर कोर्ट ऑफ जस्टिस ने 18 मार्च 2024 को पिता को मिराया की एकमात्र कस्टडी सौंपने का अंतिम आदेश जारी कर दिया।

पिता का पक्ष: उनके वकील ने तर्क दिया कि मिराया कनाडा की 'आदतन निवासी' (Habitual Resident) है और कनाडा की अदालत के आदेश का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि बच्ची को भारत में रखना 'अवैध निष्कासन' है और उसका शैक्षिक व सामाजिक विकास कनाडा में बेहतर होगा।
मां का पक्ष: प्रतिवादी मां के वकील ने तर्क दिया कि मिराया पिछले चार वर्षों से भारत में रह रही है और यहां के माहौल में पूरी तरह ढल चुकी है। उन्होंने कहा कि विदेशी डिक्री को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता और बच्ची का कल्याण उसकी मां के पास रहने में है।

न्यायालय का निर्णय: न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की पीठ ने मिराया से व्यक्तिगत रूप से चैंबर में बात की। अदालत ने पाया कि बच्ची पिछले चार वर्षों से इंदौर के एक अच्छे स्कूल में पढ़ रही है और अपनी मां के साथ भावनात्मक रूप से बहुत सहज है। न्यायालय ने विदेशी अदालत के आदेश के आधार पर कस्टडी सौंपने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

मामला 2: अंकुर जोशी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (रिट पिटीशन नंबर 23561/2025)

कहानी: यह विवाद अंकुर जोशी और उनकी पत्नी के बीच उनके दो बेटों, अर्जुन (जन्म 2016) और शौनक (जन्म 2022), की कस्टडी से संबंधित है। यह परिवार 2017 से अमेरिका के टेक्सास में रह रहा था। अगस्त 2024 में, पत्नी बच्चों के साथ भारत आई और वापस नहीं लौटी। पिता ने टेक्सास की 480वीं ज्यूडिशियल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से संपर्क किया, जिसने 14 अप्रैल 2025 को अंकुर को बच्चों का 'एकमात्र प्रबंधकीय संरक्षक' (Sole Managing Conservator) नियुक्त किया। पिता ने इसी आदेश के आधार पर भारत में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की।

पिता का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि बच्चे अमेरिकी नागरिक हैं और उनकी 'आदतन शिक्षा और स्थिरता' टेक्सास से जुड़ी है। उन्होंने दावा किया कि बच्चों को भारत में रखना विदेशी अदालत के आदेश का उल्लंघन है।
मां का पक्ष: उनके वकील ने दलील दी कि बच्चे पिछले आठ महीनों से भारत में हैं और यहां के स्कूल में अच्छी तरह सेटल हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि छोटे बच्चों को मां की देखभाल की सख्त जरूरत है।
न्यायालय का निर्णय: अदालत ने गौर किया कि अंकुर जोशी अमेरिका में अकेले रहते हैं, जबकि बच्चों का दादाजी भारत में ही रहते हैं। बच्चों के साथ बातचीत में न्यायालय ने पाया कि वे अपनी मां के साथ गहरे भावनात्मक जुड़ाव में हैं। पीठ ने दोहराया कि केवल विदेशी डिक्री के आधार पर बच्चों को ऐसे माहौल से उखाड़ना, जहां वे सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, उनके हित में नहीं होगा। न्यायालय ने यह याचिका भी खारिज कर दी।

न्यायालय ने रिट पिटीशन नंबर 22416/2024 और 23561/2025 में बच्चों की कस्टडी के मामले में निर्णय देते समय भारतीय पौराणिक कथाओं और समाज में माता की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए रामायण और महाभारत के निम्नलिखित उदाहरण दिए हैं:

1. रामायण का उदाहरण (माता: बच्चे का प्रथम आश्रय)
न्यायालय ने बताया कि श्री राम से अलग होने के बाद, लव और कुश का पालन-पोषण विशेष रूप से उनकी माता सीता द्वारा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में किया गया था। यद्यपि श्री राम अयोध्या के राजा और उनके पिता थे, फिर भी बच्चे अपनी माता के साथ रहे। यह उदाहरण बच्चे की भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक परवरिश और मातृ संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है।
वाल्मीकि रामायण का श्लोक: अयोध्या कांड के हवाले से कहा गया है "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

2. महाभारत का उदाहरण (सामाजिक वैधता से परे माता की कस्टडी)
न्यायालय ने कुंती और कर्ण का उदाहरण देते हुए कहा कि यद्यपि कर्ण का पालन-पोषण राधा (दूसरी महिला) ने किया था, लेकिन कुंती जीवन भर उनकी नैतिक माता बनी रहीं। यह दर्शाता है कि अलगाव से मातृत्व समाप्त नहीं होता और बच्चे का अपनी माँ के साथ जुड़ाव आंतरिक और प्राकृतिक है।

इन उदाहरणों के माध्यम से माननीय न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि रामायण और महाभारत कस्टडी को माता-पिता के बीच के विवाद के रूप में नहीं, बल्कि बच्चे के प्रति कर्तव्य के रूप में देखते हैं। माता को बच्चे का पहला घर, पहला शिक्षक और पहला रक्षक बताया गया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि माँ के साथ रहने का बच्चे का अधिकार केवल एक कानूनी ढांचा नहीं बल्कि एक सभ्यतागत मानक (Civilizational Norm) है।
भोपाल समाचार से जुड़िए
कृपया गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें यहां क्लिक करें
टेलीग्राम चैनल सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें
व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए  यहां क्लिक करें
X-ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
फेसबुक पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
समाचार भेजें editorbhopalsamachar@gmail.com
जिलों में ब्यूरो/संवाददाता के लिए व्हाट्सएप करें 91652 24289

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!