भोपाल के इन इलाकों में सबसे ज्यादा अवैध कालोनियां, खरीदने से पहले चेक कर लें

Updesh Awasthee
भोपाल, 21 अप्रैल 2026:
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की कुछ इलाके ऐसी हैं जहां पर अवैध कॉलोनी की संख्या सबसे ज्यादा है। कलेक्टर की कठोर कार्रवाई के बावजूद मैदानी अधिकारियों की मिली भगत से अवैध कॉलोनी की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यदि आप भोपाल में प्रॉपर्टी खरीदने जा रहे हैं तो कृपया कुछ इलाकों का विशेष ध्यान रखें और प्रॉपर्टी खरीदने से पहले चेक कर लें। कहीं ऐसा ना हो कि पैसा भी चला जाए और नामांतरण भी ना हो। 

Planning to Buy Property in Bhopal? Check These Areas with Maximum Illegal Colonies

भोपाल शहर में 70 अवैध कॉलोनियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जबकि 63 लोगों पर नामजद एफआइआर दर्ज की है। प्रशासन की ओर से 33 कॉलोनियों में रजिस्ट्री और नामांतरण पर रोक लगा दी गई है। हताईखेड़ा और रोलूखेड़ी जैसे क्षेत्रों में अवैध निर्माणों को जेसीबी मशीनों की मदद से ध्वस्त किया गया है। अवैध कॉलोनियों की अधिकता वाले क्षेत्रों में रातीबड़, नीलबड़, पिपलिया बरखेड़ी, अमरावदकलां, शोभापुर, रोलूखेड़ी, कानासैय्या, कालापानी, पचामा, थुआखेड़ा, छावनी पठार, विदिशा रोड, बैरसिया रोड, सेवनिया ओंकारा, कोलुआ खुर्द, हथाईखेड़ा, रायसेन रोड, बिशनखेड़ी, कलखेड़ा, करोंद, संतनगर, भौंरी आदि शामिल है।

जो कहे हम तो बैठे हैं, उसी से सावधान रहिए
प्रॉपर्टी डीलिंग में, अवैध प्रॉपर्टी बेचने वाले हमेशा इस बात की कोशिश करते हैं की प्रॉपर्टी की सर्च रिपोर्ट के बिना ही रजिस्ट्री हो जाए। प्रॉपर्टी खरीदते समय यदि उनसे कोई सवाल करो तो अक्सर उनका जवाब होता है "हम तो बैठे हैं"। कृपया हमेशा ध्यान रखिए, यदि प्रॉपर्टी की डीलिंग में कोई व्यक्ति प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर "हम तो बैठे हैं" बोल रहा है तो उससे सबसे ज्यादा सावधान रहें। सर्च रिपोर्ट के बिना प्रॉपर्टी खरीदना खतरे से खाली नहीं।

एमओयू, एग्रीमेंट या पार्टनरशीप के आधार पर नामांतरण नहीं होगा

भोपाल शहर में नामांतरण कराने वालों के लिए खबर है। अब एमओयू, अनुबंध या पार्टनरशीप के दस्जावेजों को नामांतरण का आधार नहीं बनाया जाएगा। प्रशासन की ओर से तहसील कार्यालयों को इसे लेकर स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं। रजिस्टर्ड डीड की बजाय अन्य दस्तावेज लगाकर नामांतरण के लिए आ रहे आवेदनों की संख्या व स्थिति देखने के बाद ये निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश समेत जिले में नामांतरण के लिए खरीद-बिक्री की रजिस्डर्ट डीड, विरासत दस्तावेज, गिफ्ट डीड, वसीयत, विभाजन, कोर्ट आदेश, पट्टा या अधिकार पत्र को आधार बनाया।

इसलिए दिए ये निर्देश
दरअसल कंपनियों के आपसी मर्जर एग्रीमेंट से नामांतरण के आवेदन आ रहे हैं। आठ नजूल क्षेत्रों में इस समय 100 से अधिक आवेदन हैं। मर्जर में कंपनी का संचालन तो चल जाता है, लेकिन पुरानी कंपनी के नाम रजिस्टर्ड संपत्ति का हस्तांतरण नहीं होता है। अन्य प्रदेशों की हाइकोर्ट ने कुछ मामलों में मर्जर एग्रीमेंट से नामांतरण के आदेश दिए। जिले में नामांतरण के लिए लगे मामलों में इन्हीं कोर्ट के आदेश का आधार लिया जा रहा है। ऐसे में प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में भू राजस्व संहिता 1959 में रजिस्टर्ड डीड का ही उल्लेख है। ऐसे में यहां इस तरह के मामलों में अन्य दस्तावेज से किए आवेदनों को अमान्य किया जाए। 
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