नई दिल्ली, 21 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि जिले के मुख्य न्यायाधीश में स्टेट या जिला न्यायालय की किसी भी जज को समन जारी करने से पहले न्यायिक विवेक का उपयोग करना चाहिए। समन भेजना एक गंभीर बात है और बिना सोचे समझे कानूनी प्रक्रिया को सक्रिय नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई मामला स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाला (vexatious) है, तो अदालत का कर्तव्य है कि वह उसे गहराई से देखे और न्याय का मजाक न बनने दे।
सुजॉय घोष ने फिल्म कहानी-2 के विवाद की कहानी
सुजॉय घोष ने फिल्म 'कहानी' (2012) का निर्देशन किया था, जिसके लिए उन्हें 2013 में सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'कहानी-2: दुर्गा रानी सिंह' की पटकथा का पहला हिस्सा 10 अक्टूबर 2013 को 'स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन' (SWA) के साथ पंजीकृत कराया था।
शिकायतकर्ता उमेश प्रसाद मेहता का दावा: शिकायतकर्ता का आरोप था कि वह 29 जून 2015 को मुंबई में सुजॉय घोष और प्रभात कुमार ठाकुर से मिला और उन्हें अपनी पटकथा 'सबक' की एक प्रति सौंपी। शिकायतकर्ता ने अपनी पटकथा 'सबक' को 31 जुलाई 2015 को SWA के पास पंजीकृत कराया। सुजॉय घोष की फिल्म 'कहानी-2' दिनांक 2 दिसंबर 2016 को रिलीज हुई। इसे हजारीबाग के लक्ष्मी चित्रमंदिर में देखने के बाद, शिकायतकर्ता ने दावा किया कि फिल्म के अधिकांश दृश्य उसकी पटकथा 'सबक' पर आधारित हैं और घोष ने उसकी स्क्रिप्ट चुराकर कॉपीराइट का उल्लंघन किया है।
SWA ने शिकायत खारिज की लेकिन सीजेएम ने समन जारी कर दिया
SWA का निर्णय: शिकायतकर्ता ने SWA की विवाद निपटान समिति के पास शिकायत दर्ज की। विशेषज्ञों की इस समिति ने 24 फरवरी 2018 को अपने आदेश में कहा कि सुजॉय घोष की फिल्म और शिकायतकर्ता की पटकथा में कोई समानता नहीं है और शिकायत को खारिज कर दिया।
SWA में मामला लंबित रहने के दौरान ही शिकायतकर्ता ने हजारीबाग के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास शिकायत दर्ज कराई थी। SWA के विशेषज्ञों द्वारा कोई समानता न पाए जाने के बावजूद, CJM ने शिकायतकर्ता और उसके गवाहों (अजय और जय किशोर मेहता) के बयानों के आधार पर 7 जून 2018 को सुजॉय घोष के खिलाफ समन जारी कर दिया।
सुजॉय घोष ने झारखंड उच्च न्यायालय में इस कार्यवाही को रद्द करने की याचिका दायर की, लेकिन उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2025 को इसे खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि आरोपों की सच्चाई का परीक्षण मुकदमे (trial) के दौरान होना चाहिए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
अपीलकर्ता सुजॉय घोष के तर्क:
घोष के वकील ने तर्क दिया कि शिकायत या गवाहों के बयानों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उनकी फिल्म में शिकायतकर्ता की पटकथा का कौन सा हिस्सा कॉपी किया गया है। यह आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर SWA (स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन) की रिपोर्ट को अदालत से छिपाया, जिसमें विशेषज्ञों ने पहले ही कह दिया था कि दोनों कृत्यों में कोई समानता नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह था कि सुजॉय घोष ने अपनी फिल्म की पटकथा का हिस्सा 10 अक्टूबर 2013 को ही पंजीकृत करा लिया था, जबकि शिकायतकर्ता की पटकथा जुलाई 2015 में पंजीकृत हुई थी। अतः चोरी का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि घोष का काम पहले से अस्तित्व में था। उन्होंने इस मामले को पूरी तरह से फर्जी, परेशान करने वाला और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।
प्रतिवादी शिकायतकर्ता के तर्क:
शिकायतकर्ता उमेश प्रसाद मेहता के वकील ने दलील दी कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर यह पाया था कि मामला चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। उन्होंने तर्क दिया कि समन जारी करने के चरण में मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि क्या कोई मामला बनता है, न कि सबूतों का विस्तृत मूल्यांकन करना होता है।
जिला न्यायाधीशों के लिए सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आलोक अराधे और न्यायाधीश पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा की पीठ ने निम्नलिखित टिप्पणियाँ कीं:
- न्यायालय ने कहा कि किसी अभियुक्त को समन भेजना एक गंभीर बात है और आपराधिक कानून को बिना सोचे-समझे (matter of course) सक्रिय नहीं किया जाना चाहिए।
- मजिस्ट्रेट को समन जारी करने से पहले सबूतों की सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई अपराध प्रथम दृष्ट्या बनता भी है या नहीं।
- यदि कोई मामला स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाला (vexatious) है, तो अदालत का कर्तव्य है कि वह उसे गहराई से देखे और न्याय का मजाक न बनने दे।
- न्यायालय ने पाया कि हजारीबाग के CJM ने यह जांचने में विफल रहे कि फिल्म और पटकथा में वास्तव में कोई समानता थी भी या नहीं और उन्होंने केवल यांत्रिक रूप से आदेश पारित कर दिया।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हजारीबाग की अदालत में लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही (शिकायत मामला संख्या 1267/2017) को रद्द (quash) कर दिया। न्यायालय ने 7 जून 2018 के समन आदेश और झारखंड उच्च न्यायालय के 22 अप्रैल 2025 के आदेश को भी रद्द कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला पूरी तरह से तुच्छ (frivolous) है और इसे जारी रखना अपीलकर्ता के साथ अन्याय होगा।

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