BREAKING NEWS : ओबीसी क्रीमी लेयर का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट ने किया, भारत के सभी राज्यों में लागू

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 11 मार्च 2026
: सुप्रीम कोर्ट ने भारत के एक बड़े विवाद का निपटारा कर दिया। ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर मामले में क्रीमी लेयर का निर्धारण किस प्रकार से किया जाएगा, सुप्रीम कोर्ट ने आज फाइनल डिसाइड कर दिया। इस मामले का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

शामिल व्यक्ति, स्थान और संस्थान

अपीलकर्ता: भारत संघ (Union of India) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT)।
प्रतिवादी: रोहित नाथन: सिविल सेवा परीक्षा 2012 में 174वीं रैंक (पिता निजी क्षेत्र - HCL टेक्नोलॉजीज में कार्यरत)।
जी. बाबू: सिविल सेवा परीक्षा 2013 में 629वीं रैंक (पिता PSU - नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन में कार्यकारी अभियंता)।
केतन और अन्य: सिविल सेवा परीक्षा 2015 के उम्मीदवार जिनके माता-पिता PSU/बैंकों में कार्यरत थे।
डॉ. इबसन शाह आई.: सिविल सेवा परीक्षा 2016 और 2017 के उम्मीदवार।
संस्थान और न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, मद्रास, दिल्ली और केरल उच्च न्यायालय, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) की चेन्नई और एर्नाकुलम बेंच, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)।

दोनों पक्षों के तर्क 

भारत सरकार और उम्मीदवार, दोनों की तरफ से दिग्गज वकील प्रस्तुत हुए और दोनों पक्षों ने अपने समर्थन में काफी मजबूत तर्क दिए। 

भारत संघ (अपीलकर्ता) के तर्क:
क्रीमी लेयर को बाहर करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में पिछड़े लोगों तक पहुंचे, न कि उन लोगों तक जो सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं।
 सरकार का तर्क था कि 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र (Clarificatory Letter) आरक्षण प्रणाली को विकृत होने से बचाने और केवल योग्य उम्मीदवारों को लाभ दिलाने के लिए जारी किया गया था।
सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि PSU पदों और सरकारी पदों के बीच समानता (Equivalence) अभी तक स्थापित नहीं हुई है, इसलिए 1993 के कार्यालय ज्ञापन (OM) के तहत 'आय/संपत्ति परीक्षण' (Income/Wealth Test) लागू होना चाहिए और माता-पिता के वेतन को गिना जाना चाहिए।
वेतन को आय से बाहर रखने से प्रशासनिक भ्रम पैदा होगा और वास्तव में पिछड़े उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन होगा।

प्रतिवादियों के तर्क:
1993 का कार्यालय ज्ञापन (OM) कानून का अधिकार रखता है क्योंकि यह 'इंद्रा साहनी' मामले के निर्देशों और एक विशेषज्ञ समिति (राम नंदन प्रसाद समिति) की सिफारिशों के बाद जारी किया गया था।
1993 के OM के अनुसार, क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए वेतन और कृषि आय को 'आय/संपत्ति परीक्षण' से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया था।
2004 का पत्र सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और PSU/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव करता है। सरकारी कर्मचारियों के मामले में वेतन नहीं गिना जाता, जबकि PSU कर्मचारियों के मामले में गिना जा रहा था।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि DoPT के पास बिना परामर्श के 2004 का पत्र जारी करने का अधिकार नहीं था और यह 1993 के मूल OM को बदल या रद्द नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट की विशेष टिप्पणी

न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक साधारण कार्यकारी पत्र (2004 का पत्र) उस कार्यालय ज्ञापन (OM) को अधिभावी (override) या रद्द नहीं कर सकता जो संवैधानिक शक्तियों के तहत विस्तृत विचार-विमर्श के बाद जारी किया गया था।
न्यायालय ने माना कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय ब्रैकेट के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए माता-पिता के पद और सेवा की श्रेणी (Status parameters) को देखना अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस विचार का समर्थन किया कि समान श्रेणी (जैसे ग्रुप सी या डी) के पदों पर बैठे सरकारी कर्मचारियों और PSU कर्मचारियों के बीच केवल वेतन के आधार पर भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन है।

Supreme Court Determines Criteria for OBC Creamy Layer in Landmark Decision

भारत संघ द्वारा उच्च न्यायालयों के फैसलों के खिलाफ दायर की गई सभी सिविल अपीलें खारिज कर दी गईं।न्यायालय ने आदेश दिया कि उम्मीदवारों की क्रीमी लेयर स्थिति का सत्यापन 14 अक्टूबर 2004 के पत्र को ध्यान में रखे बिना, कड़ाई से 1993 के कार्यालय ज्ञापन (OM) की शर्तों के अनुसार किया जाना चाहिए।कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश दिया गया कि वह प्रतिवादी उम्मीदवारों और मध्यक्षेपकर्ताओं (intervenors) के दावों पर इस निर्णय के सिद्धांतों के अनुसार विचार करे और 6 महीने के भीतर सेवाओं का पुन: आवंटन सुनिश्चित करे।

सुप्रीम कोर्ट ने DoPT को उन उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए आवश्यक अधिसंख्य पदों (Supernumerary posts) के सृजन का निर्देश दिया, जो इस निर्णय के अनुसार गैर-क्रीमी लेयर मानदंडों को पूरा करते हैं।

अन्य विशेष विवरण

सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग कल्याण पर संसदीय समिति की 21वीं रिपोर्ट (2018-19) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि 2004 के पत्र ने स्थिति को स्पष्ट करने के बजाय और अधिक भ्रमित किया है।

प्रतिवादियों ने न्यायालय का ध्यान इस ओर दिलाया कि सरकार ने EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के मामले में एक अलग रुख अपनाया था, जहाँ उसने स्वीकार किया था कि OBC क्रीमी लेयर के लिए वेतन आय को बाहर रखा जाता है, जबकि इस मामले में वह इसका विरोध कर रही थी।
न्यायालय ने जोर दिया कि PSU और निजी क्षेत्र के पदों की सरकारी पदों के साथ समानता स्थापित करने में देरी के लिए उम्मीदवारों को दंडित नहीं किया जा सकता।
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