नई दिल्ली, 17 मार्च 2026: आज जिस मामले का फैसला हुआ है उसमें सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रश्न था, एक पद के लिए चयन परीक्षा हुई। एक उम्मीदवार को नियुक्त कर दिया गया। लेकिन दूसरे उम्मीदवार ने कोर्ट में केस किया और जीत किया। अब सवाल यह था कि जब पद एक है, नियुक्ति हो चुकी है और दूसरा कैंडिडेट भी चयनित पाया गया, तो फिर उसका क्या करें? ऐसी स्थिति में क्या करना है, सुप्रीम कोर्ट ने बेंचमार्क सेट कर दिया है। यह मामला प्रतियोगी परीक्षाओं के उम्मीदवारों और LLB स्टूडेंट के लिए बेहद उपयोगी है। जानना चाहते हैं तो पढ़िए:-
चरण प्रीत सिंह बनाम नगर निगम चंडीगढ़ (Charan Preet Singh vs. Municipal Corporation Chandigarh & Ors.) मामले का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
- केस का नाम: चरण प्रीत सिंह बनाम नगर निगम चंडीगढ़ एवं अन्य
- याचिका संख्या: सिविल अपील नंबर 3446/2026 (एस.एल.पी. (सिविल) नंबर 16533/2025 से उत्पन्न)
- फैसले की तारीख: 17 मार्च, 2026
- न्यायालय: भारत का उच्चतम न्यायालय
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति संजय करोल
पूरी कहानी: विवाद की जड़
यह मामला नगर निगम, चंडीगढ़ द्वारा 'लॉ ऑफिसर' (Law Officer) के एक पद के लिए निकाली गई भर्ती से संबंधित है। चयन का आधार केवल एक लिखित परीक्षा थी, जिसमें 100 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) पूछे गए थे। प्रत्येक सही उत्तर के लिए 1 अंक मिलना था और गलत उत्तर पर 1/4 (0.25) अंक की कटौती (नेगेटिव मार्किंग) का प्रावधान था। विवाद परीक्षा के प्रश्न संख्या 73 को लेकर शुरू हुआ, जो इस प्रकार था:
"संविधान की निम्नलिखित में से कौन सी अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त (immune) है?" विकल्प: (A) सातवीं अनुसूची, (B) नौवीं अनुसूची, (C) दसवीं अनुसूची, (D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
अमित कुमार शर्मा (प्रतिवादी संख्या 3) ने विकल्प 'D' (उपरोक्त में से कोई नहीं) को चुना, जबकि भर्ती करने वाली संस्था (नगर निगम) के अनुसार सही उत्तर विकल्प 'B' (नौवीं अनुसूची) था। इसके कारण अमित कुमार शर्मा का 1.25 अंक कट गया, जिससे वे मेरिट सूची में चरण प्रीत सिंह (अपीलकर्ता) से पीछे हो गए और चयन से बाहर हो गए।
विभिन्न अदालतों में दलीलें और निष्कर्ष
1. एकल न्यायाधीश (Single Judge - पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय):
एकल न्यायाधीश ने अमित कुमार शर्मा की याचिका खारिज कर दी थी। न्यायालय ने माना कि संविधान का अनुच्छेद 31B अभी भी अस्तित्व में है, जो मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर कानूनों को चुनौती से सुरक्षा प्रदान करता है। शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य जैसे मामलों के आधार पर विकल्प 'B' (नौवीं अनुसूची) को सही माना गया। न्यायाधीश के अनुसार, भले ही 'बुनियादी ढांचे' (Basic Structure) का टेस्ट अब लागू है, लेकिन मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के प्रति पूर्ण प्रतिरक्षण अभी भी नौवीं अनुसूची की पहचान है।
2. Division Bench - पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय
खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के फैसले को पलट दिया और अमित कुमार शर्मा के पक्ष में फैसला सुनाया।
तर्क: खंडपीठ ने आई.आर. कोएल्हो (I.R. Coelho) बनाम तमिलनाडु राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि नौवीं अनुसूची में शामिल कानून पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा से मुक्त नहीं हैं। यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर संविधान के बुनियादी ढांचे को प्रभावित करता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। इस प्रकार, अमित कुमार शर्मा द्वारा दिया गया उत्तर विकल्प 'D' (कोई नहीं) कानूनी रूप से सही साबित हो गया, और इसके आधार पर वह परीक्षा में चयनित उम्मीदवार हो गया। अमित कुमार को नियुक्ति का अधिकार प्राप्त हो गया। लेकिन नियुक्ति नहीं मिली और मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की टिप्पणी
उच्चतम न्यायालय ने पाया कि यह विवाद अत्यंत जटिल संवैधानिक व्याख्या पर आधारित है। न्यायाधीशों ने टिप्पणी की:
जब उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की राय में ही इस प्रश्न के उत्तर को लेकर भिन्नता है, तो कानून के साधारण स्नातकों (Law Graduates) से परीक्षा के दबाव में सटीक निष्कर्ष पर पहुंचने की अपेक्षा करना कठिन है।
न्यायालय ने माना कि एक कानून स्नातक के दृष्टिकोण से दोनों ही उत्तर सही हो सकते हैं। विकल्प 'B' संविधान की शाब्दिक भाषा (Bare Language) के करीब है, जबकि विकल्प 'D' उच्चतम न्यायालय द्वारा विकसित 'बुनियादी ढांचे' के सिद्धांत और आई.आर. कोएल्हो के फैसले के अनुरूप है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
न्याय और समानता को ध्यान में रखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
न्यायालय ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता (चरण प्रीत सिंह) और प्रतिवादी (अमित कुमार शर्मा) दोनों को नौकरी पर रखा जाए। चंडीगढ़ नगर निगम को आदेश दिया गया कि वह अमित कुमार शर्मा की नियुक्ति के लिए एक अतिरिक्त (Supernumerary) पद सृजित करे। चूंकि चरण प्रीत सिंह पहले ही नियुक्त हो चुके थे और काम कर रहे थे, इसलिए उन्हें अमित कुमार शर्मा से वरिष्ठ (Senior) माना जाएगा।
इस प्रकार, न्यायालय ने किसी भी उम्मीदवार को बाहर करने के बजाय दोनों की कानूनी समझ को सही मानते हुए विवाद का निपटारा किया। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने न्याय किया। नियोक्ता द्वारा यह दलील स्वीकार नहीं की गई कि उसके पास केवल एक पद है और वह दोनों में से किसी एक को ही नियुक्त कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कोई जुर्माना, क्षतिपूर्ति आदि का आदेश नहीं दिया बल्कि, परीक्षा में जटिल प्रश्न पूछा गया, उम्मीदवारों का उत्तर सहित था, विवाद की स्थिति में नियुक्ति को स्थगित नहीं किया गया इसलिए दोनों उम्मीदवारों को नौकरी दी गई।

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