भोपाल में आर्मी ऑफिसर ने महिला सिपाही का रेप नहीं किया, हाई कोर्ट का फैसला, FIR रद्द

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 15 मार्च 2026
: जबलपुर स्थित हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश ने आर्मी ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वरुण प्रताप सिंह के खिलाफ मध्य प्रदेश पुलिस की महिला आरक्षक द्वारा भोपाल में दर्ज करवाई गई रेप की FIR को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि वरुण प्रताप सिंह और महिला आरक्षण के बीच में फिजिकल रिलेशन थे, लेकिन वरुण ने उसका रेप नहीं किया, जबकि महिला आरक्षक ने वरुण पर प्रेशर क्रिएट करने के लिए FIR दर्ज करवाई थी। 

Lt Col Varun Pratap Singh’s Love Story and the High Court Order Explained

यह मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण मामले (MCRC No. 35779 of 2025) का विवरण है। जिसका फैसला न्यायमूर्ति विनय सराफ द्वारा 11 मार्च, 2026 को सुनाया गया। मामले के मुख्य पक्षकार और स्थान:
याचिकाकर्ता (अभियुक्त): वरुण प्रताप सिंह, जो भारतीय सेना (Indian Army) में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत हैं।
प्रतिवादी : नंबर 1 मध्य प्रदेश राज्य और नंबर 2 (शिकायतकर्ता): भोपाल के लोकायुक्त संगठन (Special Police Establishment) में महिला पुलिस कांस्टेबल के पद पर कार्यरत एक महिला।
न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर पीठ।
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति विनय सराफ।
संबंधित पुलिस थाना: महिला थाना, भोपाल।

लेफ्टिनेंट कर्नल वरुण प्रताप सिंह की लव स्टोरी

महिला आरक्षक और लेफ्टिनेंट कर्नल वरुण प्रताप सिंह की पहली मुलाकात 23 दिसंबर, 2012 को शाहजहाँनाबाद, भोपाल स्थित आर्मी कैंटीन में हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच मोबाइल पर बातचीत शुरू हुई। महिला कांस्टेबल का आरोप था कि लेफ्टिनेंट कर्नल वरुण प्रताप सिंह ने खुद को अविवाहित बताया और शादी का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। पहली बार शारीरिक संबंध 25 दिसंबर, 2012 को बनाए गए और उसके बाद यह सिलसिला कई बार चला।

प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, साल 2013 में महिला सिपाही को पता चला कि लेफ्टिनेंट कर्नल वरुण प्रताप सिंह पहले से विवाहित है। जब उसने इस बारे में पूछा, तो याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर कहा कि उसकी पत्नी का चरित्र खराब है, वे साथ नहीं रहते और जल्द ही वह तलाक लेकर उससे शादी कर लेगा। यह रिश्ता साल 2012 से 2025 तक, यानी लगभग 12-13 वर्षों तक चला।

पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद शिकायत के अनुसार, 24 फरवरी, 2025 को महिला सिपाही को पता चला कि वरुण प्रताप सिंह अन्य महिलाओं के संपर्क में भी है और उन्हें भी इसी तरह का आश्वासन दे रहा है। इसके बाद वरुण प्रताप द्वारा धमकी दिए जाने पर महिला आरक्षण ने 27 मार्च, 2025 को भोपाल के महिला थाने में प्राथमिकी (FIR No. 95/2025) दर्ज कराई। वरुण प्रताप सिंह के खिलाफ यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 351(2) और 69 के तहत दर्ज किया गया था।

वरुण प्रताप सिंह के वकील कैलाश चंद्र घिल्डियाल और अवधेश कुमार अहिरवार) के तर्क:

उन्होंने तर्क दिया कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति और समझ के आधार पर थे। शिकायतकर्ता महिला, एक शिक्षित और परिपक्व महिला है जो स्वयं पुलिस विभाग में कांस्टेबल के रूप में कार्यरत है, इसलिए उसे कानूनी परिणामों और स्थिति का पूरा ज्ञान था। रिश्ता 13 साल तक चला और जब वह खराब हुआ, तब 13 साल बाद यह FIR दबाव बनाने के लिए दर्ज की गई।

वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के 'प्रशांत बनाम दिल्ली राज्य' और 'विश्वज्योति चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल' जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल शादी का वादा टूटना बलात्कार नहीं है, खासकर तब जब महिला को पुरुष के विवाहित होने की जानकारी पहले से हो।

महिला आरक्षक के वकील नलिनी गुरुंग और दिनेश त्रिपाठी के तर्क:

वकीलों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने शुरू से ही खुद को अविवाहित बताकर धोखा दिया और गलत इरादे से सहमति प्राप्त की। चूंकि याचिकाकर्ता सेना में कार्यरत था, इसलिए शिकायतकर्ता ने उस पर भरोसा किया।शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि शारीरिक संबंध की सहमति, शादी के झूठे वादे पर आधारित थी, इसलिए यह 'तथ्य की गलत धारणा' (misconception of fact) के तहत बलात्कार का मामला बनता है। उन्होंने यह भी बताया कि वरुण प्रताप सिंह ने महिला आरक्षक के माता-पिता को भी शादी का आश्वासन दिया था।

न्यायमूर्ति विनय सराफ की विस्तृत टिप्पणियाँ:

माननीय न्यायमूर्ति विनय सराफ ने मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं:
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 375 (बलात्कार) के संदर्भ में 'सहमति' का अर्थ केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि उस कार्य के प्रति सक्रिय और तर्कपूर्ण विचार (active and reasoned deliberation) होना चाहिए। एक व्यक्ति जो विभिन्न विकल्पों और परिणामों का मूल्यांकन करने के बाद निर्णय लेता है, उसकी सहमति स्वेच्छापूर्ण मानी जाती है।
  • न्यायमूर्ति ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि शिकायतकर्ता स्वयं पुलिस विभाग (लोकायुक्त संगठन) में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है। स्रोतों के अनुसार, यह अकल्पनीय है कि पुलिस विभाग में काम करने वाली एक शिक्षित महिला बिना अपनी स्वेच्छा के इतने लंबे समय (13 वर्ष) तक शारीरिक संबंध बनाए रखेगी।

Misconception of Fact: 

न्यायालय ने कहा कि शादी के वादे के आधार पर सहमति को तभी दूषित माना जा सकता है जब दो शर्तें पूरी हों: पहली, वादा शुरू से ही बदनीयती और झूठा होना चाहिए, और दूसरी, उस वादे का महिला के यौन संबंध बनाने के निर्णय से सीधा संबंध होना चाहिए।

स्रोतों के अनुसार, याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता का रिश्ता 12 से 13 वर्षों तक चला। न्यायालय ने टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता को 2013 में ही पता चल गया था कि याचिकाकर्ता शादीशुदा है, फिर भी उसने बिना किसी विरोध या आपत्ति के 2025 तक इस रिश्ते को जारी रखा। इतने लंबे समय तक चले रिश्ते को केवल शादी के झूठे वादे पर आधारित बलात्कार नहीं माना जा सकता।

शादी का वादा टूटने और झूठे वादे में अंतर

न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि 'वादे का उल्लंघन' (Breach of promise) और 'झूठा वादा' (False promise) दो अलग बातें हैं। यदि कोई वादा शुरू से ही धोखा देने के इरादे से नहीं किया गया था, तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता। इसका मतलब हुआ कि झूठा वादा वह है जिसमें शुरू से ही इरादा गलत और साजिश हो जबकि वादा टूट जाने का मतलब है परिस्थितियों के कारण ऐसा किया गया जबकि रिश्ते की शुरुआत ऐसी नहीं थी। रिश्ते की शुरुआत में कोई साजिश या झूठ नहीं था।

न्यायालय ने यह भी महसूस किया कि रिश्ता टूटने के बाद महिला आरक्षक ने वरुण प्रताप सिंह पर दबाव बनाने के लिए यह प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी।

न्यायालय का फैसला:

सभी तथ्यों, कानूनी नजीरों और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (जैसे प्रशांत बनाम दिल्ली राज्य और प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य) को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने निम्नलिखित फैसला सुनाया:
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला बलात्कार का नहीं बल्कि पारस्परिक सहमति से बने संबंधों (consensual relationship) का है।

न्यायमूर्ति विनय सराफ ने माना कि इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है। प्राथमिकी में लगाए गए आरोप वरुण प्रताप सिंह के खिलाफ धारा 69 या 351(2) के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

FIR और कार्यवाही Quashed

न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए भोपाल के महिला थाने में दर्ज प्राथमिकी (FIR No. 95/2025) को निरस्त (Quashed) कर दिया। प्राथमिकी के साथ-साथ याचिकाकर्ता के खिलाफ दायर चार्जशीट और निचली अदालत में चल रही सभी कानूनी कार्यवाहियों को भी पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। यह याचिका बिना किसी शुल्क (no order as to costs) के मंजूर की गई और मामला बंद कर दिया गया। 

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