संविदा कर्मचारी भर्ती घोटाला, शिवपुरी के कलेक्टर और ADM के खिलाफ कार्रवाई हेतु हाईकोर्ट का आदेश

Updesh Awasthee
ग्वालियर, 20 मार्च 2026
: मध्य प्रदेश के शिवपुरी में साल 2014 में हुए संविदा कर्मचारी भर्ती घोटाले में हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच ने, पूरी भर्ती प्रक्रिया को निरस्त करके दोबारा शुरू करने और साल 2014 में शिवपुरी में पदस्थ रहे कलेक्टर एवं ADM के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा याचिका प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवार को डेढ़ लाख रुपए का मुआवजा भी मिलेगा। 

मामले की पूरी कहानी: नियमों को ताक पर रखकर निकाली गई भर्ती

विवाद की जड़ 26 सितंबर 2014 को अपर कलेक्टर, शिवपुरी द्वारा जारी किया गया एक विज्ञापन है। यह विज्ञापन मध्य प्रदेश शासन के राजस्व विभाग द्वारा 11 सितंबर 2014 को जारी निर्देशों के तहत 'कार्यालय सहायक-सह-डाटा एंट्री ऑपरेटर' के पदों पर संविदा नियुक्ति के लिए निकाला गया था। राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश थे कि यह भर्ती प्रक्रिया लोक सेवा प्रबंधन विभाग द्वारा 14 जुलाई 2011 को जारी किए गए सर्कुलर (परिपत्र) के आधार पर पूरी की जानी चाहिए।

High Court of Madhya Pradesh Orders Action Against Shivpuri Collector and ADM, Major Administrative Development

WRIT PETITION No. 464 of 2015 के अनुसार, 2011 के उस सर्कुलर में निर्धारित योग्यता केवल स्नातक (Graduation) थी और चयन का आधार स्नातक में प्राप्त अंकों की मेरिट लिस्ट होना था। साथ ही, उस सर्कुलर के अनुसार उम्मीदवार का विज्ञान विषय (Science) में स्नातक होना अनिवार्य था। हालांकि, शिवपुरी के तत्कालीन अपर कलेक्टर ने इन नियमों की अनदेखी करते हुए विज्ञापन में स्नातक में न्यूनतम 60% अंकों की नई शर्त जोड़ दी। इसके अलावा, विज्ञापन में विज्ञान विषय की अनिवार्यता को भी दरकिनार कर दिया गया, जिसका अर्थ यह था कि किसी भी विषय के स्नातक आवेदन कर सकते थे, बशर्ते उनके 60% अंक हों।

हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता का पक्ष: 

याचिकाकर्ता योगेश कुमार कुशवाह की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता श्री जय प्रकाश कुशवाह ने न्यायालय को बताया कि जिला प्रशासन ने राज्य सरकार के आदेशों का खुला उल्लंघन किया है। जब राज्य सरकार के 2011 के सर्कुलर में केवल स्नातक की डिग्री मांगी गई थी, तो अपर कलेक्टर को 60% की न्यूनतम सीमा तय करने का कोई अधिकार नहीं था। सर्कुलर के अनुसार योग्यता 'विज्ञान स्नातक' होनी चाहिए थी, लेकिन विज्ञापन में इसे बदलकर किसी भी विषय के स्नातक के लिए खोल दिया गया, जो नियमों के विरुद्ध है। अन्य जिलों में भर्ती प्रक्रिया 2011 के सर्कुलर के अनुसार ही की गई, लेकिन केवल शिवपुरी में नियमों को बदला गया।

प्रतिवादी (शिवपुरी जिला प्रशासन) का पक्ष: मध्य प्रदेश शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता श्री रिंकेश गोयल ने विज्ञापन का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि, अपर कलेक्टर, शिवपुरी द्वारा निर्धारित की गई योग्यताएं सही हैं और इसमें किसी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है। प्रशासन ने अपने विवेक के आधार पर शैक्षणिक मानदंड तय किए हैं, इसलिए याचिका को खारिज किया जाना चाहिए। 

न्यायाधीश की तीखी टिप्पणी: नियमों की अनदेखी अक्षम्य

मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय न्यायाधीश आनंद सिंह बहरावत ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:
न्यायालय ने पाया कि राज्य सरकार के राजस्व विभाग ने 11 सितंबर 2014 के अपने आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि भर्ती प्रक्रिया 14 जुलाई 2011 के सर्कुलर के अनुसार होनी चाहिए। इसके बावजूद, शिवपुरी के अतिरिक्त कलेक्टर ने उन शर्तों को दरकिनार कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2011 के सर्कुलर में केवल 'विज्ञान स्नातक' की अनिवार्यता थी और अंकों की कोई न्यूनतम सीमा (जैसे 60%) तय नहीं थी। अतिरिक्त कलेक्टर ने अपनी मर्जी से विज्ञान की अनिवार्यता हटा दी और 60% अंकों की नई शर्त थोप दी, जो कि नियमों के विरुद्ध था।
न्यायाधीश ने इस बात पर भी गौर किया कि जब अन्य जिलों में भर्ती प्रक्रिया 2011 के सर्कुलर के आधार पर सही तरीके से की गई, तो केवल शिवपुरी में इन नियमों को क्यों बदला गया? 
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि कलेक्टर ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करते हुए सर्कुलर के विपरीत विज्ञापन जारी किया है।

न्यायालय का विस्तृत फैसला और निर्देश

न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए प्रशासन को कड़े निर्देश जारी किए हैं:
  • कोर्ट ने 26 सितंबर 2014 को जारी किए गए विवादित विज्ञापन को तत्काल प्रभाव से रद्द (Quash) कर दिया है। इसके साथ ही, इस विज्ञापन के आधार पर की गई सभी नियुक्तियां और अन्य परिणामी कार्रवाइयां भी निरस्त कर दी गई हैं।
  • शिवपुरी कलेक्टर को आदेश दिया गया है कि वे आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर 14 जुलाई 2011 के सर्कुलर के अनुसार सख्ती से नया भर्ती विज्ञापन जारी करें।
  • चूंकि याचिकाकर्ता (योगेश कुमार कुशवाह) को प्रशासन की गलती के कारण इस लंबी कानूनी लड़ाई में उलझना पड़ा, इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया है कि नई भर्ती प्रक्रिया में उसे आयु सीमा (Age Bar) के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
  • न्यायालय ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वे तत्कालीन कलेक्टर और अतिरिक्त कलेक्टर के विरुद्ध उचित कार्रवाई करें, जिन्होंने नियमों की अनदेखी कर यह विज्ञापन जारी किया था।

भारी जुर्माना और मुआवजे का प्रावधान

प्रशासन की लापरवाही के कारण याचिकाकर्ता को हुए नुकसान की भरपाई के लिए कोर्ट ने आर्थिक दंड भी लगाया है। उत्तरदाताओं (मध्य प्रदेश शासन और शिवपुरी जिला प्रशासन) को आदेश दिया गया है कि वे याचिकाकर्ता को मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में 1,50,000 रुपये का भुगतान 30 दिनों के भीतर करें। इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने 25,000 रुपये की राशि ग्वालियर नगर निगम के 'स्वच्छता पेनल्टी एवं गारबेज' खाते में जमा करने का आदेश दिया है।

अधिकारियों से वसूली: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने सरकार को यह स्वतंत्रता दी है कि वह जुर्माने और मुआवजे की कुल 1,75,000 रुपये की राशि दोषी अधिकारियों से वसूल कर सकती है, हालांकि इसके लिए उन्हें सुनवाई का अवसर देना होगा।

इस ऐतिहासिक फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में प्रशासनिक मनमानी के लिए कोई जगह नहीं है और नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है। 

घोटाले के समय शिवपुरी का कलेक्टर कौन था 

हमें मिली जानकारी के अनुसार 11 सितंबर 2014 को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री राजीव दुबे (Rajeev Dubey) शिवपुरी के कलेक्टर थे। उन्होंने हाल ही में आर.के. जैन के स्थान पर शिवपुरी कैरेक्टर का पदभार ग्रहण किया था और वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। 2015 में श्री राजीव दुबे का ट्रांसफर हो गया था।
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