मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने महाशिवरात्रि के अवसर पर डबरा में नवग्रह मंदिर में डॉक्टर कुमार विश्वास के द्वारा भगवान श्री राम के चरित्र की व्याख्या करने से पूर्व, उनसे एक प्रश्न किया। डॉक्टर कुमार विश्वास ने तो इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया परंतु हम यहां पर आपको प्रश्न और उत्तर दोनों दे रहे हैं।
ऋषि विश्वामित्र ने राजा दशरथ को धोखा क्यों दिया, झूठ क्यों बोला
— Adhiraj Awasthi (@AdhirajOnline) February 16, 2026मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस प्रश्न को बड़े ही संतुलित शब्दों में किया है। आप वीडियो में देख सकते हैं लेकिन हम यहां प्रश्न को सरल और स्पष्ट लिख रहे हैं:-
डॉ मोहन यादव ने पूछा कि, गुरुकुल से लौट कर आए किशोर अवस्था के श्री राम को ऋषि विश्वामित्र सिर्फ यज्ञ-रक्षा और राक्षस-वध करवाने के लिए महाराजा दशरथ से मांग कर ले गए थे। दोनों के बीच यहीं तक (यज्ञ-रक्षा और राक्षस-वध) की बात थी। इसके बाद भी ऋषि विश्वामित्र श्री राम को, राजा जनक के दरबार में, माता सीता के स्वयंवर में ले गए। जहां रावण सहित विश्व के तमाम शक्तिशाली राजा उपस्थित थे, और फिर परशुराम प्रसंग भी हुआ। परशुराम का क्रोध सभी जानते हैं। यह अनुशासनहीनता थी और श्री राम लक्ष्मण के जीवन के लिए जोखिम भी था। फिर ऋषि विश्वामित्र ने ऐसा क्यों किया।
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने यह प्रश्न भगवान श्री राम के चरित्र की व्याख्या के लिए प्रसिद्ध व्याख्याता डॉ कुमार विश्वास से किया था। उन्होंने अपने प्रवचन के दौरान इस प्रसंग की व्याख्याता की परंतु प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।
एक मान्यता है कि यदि कोई भी प्रश्न उचित उत्तर के बिना घूमता है तो यह शुभ नहीं होता। इसलिए हमने प्रस्तुत हुए प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया। हमको जो मिला वह इस प्रकार है:-
अध्ययन के दौरान हमको पता चला कि प्रसंग इस प्रकार से घटित नहीं हुआ था, जिस प्रकार से घटनाक्रम का वर्णन हुआ है बल्कि असली कहानी इससे उल्टी है। ऋषि विश्वामित्र को पहले ही पता चल गया था, कि जनकनंदिनी का स्वयंवर होने वाला है और राजा जनक "शिवधनुष" की चुनौती रखने वाले हैं। राजा जनक के दरबार में रखा शिवधनुष केवल शक्ति की नहीं, धर्म + मर्यादा + संयम की परीक्षा था।
विश्वामित्र केवल एक ऋषि नहीं थे बल्कि भविष्यद्रष्टा तपस्वी थे। उन्हें पता था कि इस प्रतियोगी परीक्षा का एकमात्र योग्य उम्मीदवार राजा दशरथ का पुत्र राम है, लेकिन वह तो किशोर है, और फिर यह भी पता लगाना था कि, उन्होंने अपनी दृष्टि से जो भविष्य देखा है, वह सही भी है या नहीं। इसलिए उन्होंने श्री राम की (धर्म + मर्यादा + संयम) परीक्षा का निर्णय लिया। यज्ञ-रक्षा और राक्षस-वध उसी परीक्षा का नाम है। ऋषि विश्वामित्र को पूर्ण विश्वास था कि:
जो ताड़का का वध कर सकता है
जो ब्रह्मास्त्र को साध सकता है
जो गुरु आज्ञा में पूर्णतः स्थित है
वही शिवधनुष उठा सकता है।
इस प्रकार ऋषि विश्वामित्र ने ना तो महाराज दशरथ को कोई धोखा दिया और ना ही किसी प्रकार की अनुशासनहीनता की बल्कि जो कुछ भी हुआ वह उनकी योजना का हिस्सा था।
लक्ष्मी स्वरूपा माता सीता के "स्वयंवर प्रसंग" में आयोजन की तिथि तक का निर्णय ही राजा जनक ने स्वतंत्रता पूर्वक लिया। बाकी सब कुछ ऋषि विश्वामित्र की रणनीति का हिस्सा था। व्याख्याता: उपदेश अवस्थी (लेखक पत्रकार एवं विधि सलाहकार भी है)।

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