यहाँ भी अपनी इंडीवीजुअलिटी के आकर्षण का आत्मविश्वास नहीं - My Opinion by Manoj Shrivastava

Updesh Awasthee
माने स्त्री आज भी उसी आदिमयुगीन तरह से देखी जाती रहे जब कबीलों की आपसी लड़ाई को खत्म करने के लिए एक कबीले की लड़की दूसरे कबीले में ब्याह दी जाती थी। विवाह गठबंधन का उपयोग जनजातियों या राज्यों के बीच झगड़ों को सुलझाने के लिए किया जाता था।  मध्ययुगीन अध्ययनों में महिलाओं को अक्सर peace weavers (शांति-बुनकर) कहा जाता था, लेकिन यदि गठबंधन विफल हो जाता था, तो ये महिलाएँ सामुदायिक तनाव का मुख्य बोझ उठाती थीं, जिससे अलगाव और आघात होता था। 

लड़की को हलफनामा समझ रखा है क्या

यह मांग महिलाओं को “प्रतीकात्मक पूंजी” के रूप में मानती थी, न कि स्वायत्त सत्ता के रूप में। कि बेटी का जीवन और प्रजनन एक समुदाय द्वारा दूसरे की सामाजिक स्वीकृति खरीदने के लिए व्यापार करने योग्य संपत्ति हैं। Robert Nozick ने ऐसे ही प्रकरणों के लिए violation of self-ownership का सिद्धांत दिया होगा। अपने आप पर लड़की के स्वत्व का उल्लंघन। लड़की को उसके वर्ण या जाति की innocence का हलफनामा समझ रखा है क्या, या वह कोई ट्रॉफ़ी है जिसे ये दूसरे नपुंसक महाशय जीत कर लाने के नये सामंतवाद में ग्रस्त हैं। 

और दिल्ली के उन परिसरों में पितृसत्ता का पाठ पढ़ाने वाले इसमें सबसे घृणित किस्म की पितृसत्ता नहीं देखते। 
कि जहाँ एक पवित्र, निजी बंधन राजनीतिक लेन-देन में बदल जाता है, जहाँ एक लड़की पुरुष-प्रधान सामाजिक समूहों के लिए शांति की मध्यस्थता करने वाला पुल बन जाती है।

यह कबीलाई मानसिकता घिनौनी और प्रतिगामी है और उससे भी ज्यादा घिनौना यह है कि यह पढ़े लिखे परिसरों में गूँज रही है। 

यहाँ भी आत्मविश्वास नहीं

प्यार हो तो कोई किसी से विवाह कर ले। पर अपने पुरुषत्व और पुरुषार्थ पर भरोसा ही नहीं है। जैसे शिक्षा और नौकरी योग्यता के न होने के बावजूद मिल गई वैसे ही अब यह भी चाहिए। यहाँ भी अपनी इंडीवीजुअलिटी के आकर्षण का आत्मविश्वास नहीं। 

क्यों भाई, जब उस लड़की के वर्ण से तुम्हें नफ़रत है

हमारे यहां जब राजा रामगुप्त ने ध्रुवस्वामिनी को ऐसे ही शांति के बदले विनिमय करना चाहा तो उसके भाई चंद्रगुप्त तक ने विद्रोह कर दिया था, और तुम्हें चाहिए। क्यों भाई, जब उस लड़की के वर्ण से तुम्हें नफ़रत है। तुम सोते जागते उठते बैठते उसके धर्म को, धर्मग्रंथों को, उसके देवी देवताओं को, उसकी आस्था के मान-बिंदुओं को, उसके संस्कारों को गाली देते हो और तुम्हें पत्नी भी उन्हीं से लाना है। तुम्हारे भीतर कोई गुडविल नहीं और तुम दूसरे से गुडविल जेस्चर के रूप में उसकी बेटी माँग रहे हो। बेटी न हुई मोम की गुड़िया हो गई। या कि तुम्हें उसके मन, चित्त, हृदय, प्रज्ञा से कोई मतलब नहीं, बस वह एक शरीर मात्र है जिस पर तुम अपना कबीलाई रुतबा चाहते हो। 

लड़की अपनी शादी किसी द्वेष में क्यों करे? वह क्यों एक spiritual violence सहे किसी domestic violence को avoid करने के लिए? 

यह गहन अपमान का कार्य है, न कि सुलह का

रूडोल्फ ओट्टो की पुस्तक ‘द आइडिया ऑफ द होली’ (1917) ‘न्यूमिनस’ (पवित्र) की अवधारणा पर जोर देती है कि आस्था कोई सौदेबाजी योग्य सांस्कृतिक बोझ नहीं है; यह व्यक्ति के अस्तित्वगत अभिमुखीकरण का मूल है। ऐसी शादी की मांग करना उसी प्रकार है जैसे किसी भक्त से यह कहना कि वह एक ऐसे रिश्ते में प्रवेश करे जहाँ उनका ईश्वर रोजाना निंदा का शिकार हो, यह गहन अपमान का कार्य है, न कि सुलह का।
यदि अपनी आस्था ऐसी बनाई होती कि जो दूसरे की आस्था के अपमान से पोषण नहीं प्राप्त करती तो बेटी के लिए वह संज्ञानात्मक असंगति (cognitive dissonance) पैदा नहीं करती। 

लियोन फेस्टिंगर के सिद्धांत अनुसार तब उसे या तो अपना विश्वास दबाना पड़ता है (जो आंतरिक उत्पीड़न की ओर ले जाता है) या लगातार सूक्ष्म आक्रमणों को सहना पड़ता है, दोनों ही रास्ते चिंता और अवसाद की ओर ले जाते हैं। 

न कोई पारस्परिक सहमति, न कोई भावनात्मक मेल, न कोई वेवलेंथ का मिलना, न समान जीवन मूल्य और न कोई पर्सनल च्वाइस- बस एक तर्क कि अंबेडकर ने कहा था। लड़की को इतना इंस्ट्रुमेंटलाइज करने में आजकल के परिसर आधुनिकता समझ रहे हैं। 

तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला 

विवाह जैसे पवित्र रिश्ते को भी सोशल ब्लैकमेल से बदलने में इन्हें शर्मिंदगी नहीं होती। न किसी राज्य को न किसी समाज को न किसी परिवार को न किसी विश्वविद्यालय को यह अधिकार है कि वह किसी लड़की पर अपना तत्कथित सामाजिक न्याय आरोपित करे। जीवन के सबसे अंतरंग रिश्ते बाहर से डिक्टेट नहीं किये जाते। 

कि वे कहेंगे ये पाखंड है। कब लड़की की मर्जी पूछी गई? अनमेल विवाह करा दिये गये और हमारे संदर्भ में ये सब याद आ रहे। 
यानी आधुनिक युग के सुशिक्षित परिसरों का तर्क यह है कि पाखंड का विखंडन पाखंड से ही हो। लड़की सौंप कर अपना वैलिडेशन हमारी नज़रों में कराओ। 

तुम कौन सी पाटी पढ़े हो लला कि मानव अधिकार की सार्वभौमिक उद्घोषणा का अनुच्छेद 16 तुम्हें दिखा ही नहीं कि विवाह दोनों intending पार्टनर्स की free and full consent से होगा? 

पर यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 25 (अविवेक और धर्म की स्वतंत्रता) से टकराने वाली बात है। सुप्रीम कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) तथा शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) में बार-बार पुष्टि की है कि वयस्क व्यक्ति को अपने जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है, जो परिवार, समुदाय या समाज के आदेश से मुक्त हो। 

इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए कोई तीसरा पक्ष,, चाहे वह धार्मिक समूह हो, राजनीतिक संगठन हो या सोशल मीडिया भीड़, ‘ईमानदारी’ के प्रमाण के रूप में किसी विशेष वैवाहिक विकल्प की मांग legitimately नहीं कर सकता। कि ऐसा दबाव persuasion नहीं, नैतिक अपील के भेष में coercion है। 

समाजशास्त्री रॉबर्ट मर्टन की एक सैद्धांतिकी है जिसे कल्चरल होमोगेमी कहा गया। उसी कारण राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 95% विवाह अभी भी लोग अपनी जाति में करते हैं। इसे जातिवाद कहकर भारत को गिल्ट ट्रिप में मत भेजिये। यह शेयर्ड वैल्यूज, भाषा, प्रथाएं, खान पान आदि से होता है। कभी Centre for Study of Developing Societies, 2022 की रपट भी पढ़ लें forced exogamy के तनावों पर। 

सहिष्णुता का प्रमाणपत्र चाहिए तो बेटी ब्याह दो, बेटा नहीं कहेंगे। एक asymmetric payoff. लड़के की तरफ से कोई वायदे या प्रतिबद्धता कुछ नहीं। कि लड़की बलि का बकरा है (यहाँ जेंडर कहावत के चलते गड़बड़ हो गया) कि वह सिर्फ इस शतरंज का एक मोहरा है। लड़की की अपनी कोई इच्छा है या नहीं, पूछना ही नहीं। वह लड़की है, लड़ सकती है। 

पर सवाल यह है कि क्या कायरता और सिनिसिज्म के आधार पर कोई समाज किसी दूसरे को खुश रख सकता है? 
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर्ड अधिकारी हैं।
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