कभी उस सामूहिक सैडिज्म पर गौर कीजिए जो सामाजिक न्याय के नाम पर देश में इतने दशकों में पल्लवित पुष्पित हुआ है। इसे तत्कथित सवर्णों को झूठे मुकदमों में फँसाने पर कोई पश्चात्ताप नहीं है बल्कि आनंद की, कभी कभी तो आर्गाज्म की अनुभूति होती है।
पूर्वजों के किये अनकिये का इल्म भी नहीं है
ये अलग किस्म का retributive justice है। इसे शताब्दियों के अन्यायों की कल्प-कथाओं पर गढ़ा गया है। इसकी उजरत वे भर रहे हैं जिन्हें अपने पूर्वजों के किये अनकिये का इल्म भी नहीं है।
कभी उस व्यक्ति के दर्द से भी मिलिए जिसकी कहानी एक साधारण आरोप से शुरू हुई (भाग्य का मजाक या किसी दुष्ट का प्रपंच) जिसने उसकी आज़ादी, परिवार की उम्मीदें छीन लीं, उन्हें अनिश्चितता की जंजीरों में जकड़ दिया जबकि दुनिया आगे बढ़ गई।
2023 के आँकड़ों को देखें तो तीन लाख मामले हैं
एक या दो मामले नहीं हैं। 2023 के आँकड़ों को देखें तो तीन लाख मामले हैं जो अदालतों में लटके हुए हैं। 2021 में लगभग 96% मामलों में यह पेंडेंसी थी। और उसके साथ जेल के अँधेरे गलियारों में सामाजिक न्याय नाम की डोरी पे वे भी लटके हुए हैं जो निर्दोष साबित होने तक दोषी माने जाते हैं, जिन्हें कोई एंटीसिपेटरी बेल नहीं है।
कनविक्शन की असफलता दर 65% के लगभग है। 2018 में यह दर 72% थी। लेकिन सामाजिक न्याय की पुरोधा व्यवस्था का conviction है कि यह तो सामाजिक जनतंत्र की आवश्यक लागत है।
व्यवस्था की देरी से फँसे हुए, न्याय-अन्याय की देहरी पर फँसे हुए ये भूले हुए लोग, एक गहरे अन्याय की मिसाल हैं। पर हमारे स्वनामधन्य लोग इसे साक्ष्यों की कमी का नतीजा बताकर उनके घावों पर नमक डालने के लिए आतुर हैं।
वे कमजोर माने जा रहे हैं जो बाँह मरोड़कर उच्चतम न्यायालय का आदेश तक पलटा लेते हैं।
एक राज्य का ही उदाहरण दूँ तो उसमें एक सर्वेक्षण में 75% मामले झूठे पाए गए और इनमें OBC के विरुद्ध 81% थे।
झूठ पर कोई दंड नहीं है। झूठ हद से हद तंत्र की विफलता और सामाजिक पॉवर स्ट्रक्चर के अनुवाद के रूप में ही पढ़े लिखों द्वारा व्याख्यायित होता है। वे उसे अपने तथाकथित सच की नपुंसकता की तरह नहीं देखते। उन्हें कोई ग्लानि नहीं है।
चाहे ज़मीन का विवाद हो या व्यक्तिगत शत्रुता या कारोबारी झगड़ा या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता सब में यह अस्त्र कारगर है।
सामाजिक अन्याय का निराकरण सामाजिक अन्याय से नहीं होता। एक सर्वे में तीस में से 23 अवसाद के शिकार पाये गये और 8 ने माना कि उन्हें आत्महत्या कर लेने का विचार भी आया।18 को पैनिक अटैक्स भी आये और भारत की क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम पर उनका भरोसा भी टूट गया। कैसी व्यवस्था जो pre-trial liberty देती ही नहीं। वह जो विश्व की सारी आपराधिक न्याय प्रणाली का अनिवार्य अंग है।
देखिए कि कई परिवार बाहर इंतज़ार करते हैं, हर बेकार मुलाकात से टूटते हुए दिल लेकर। देखिए कि कैसे एक ज़िंदगी की चोरी हो गई है।
एक की या अनेक की? एक क्रिमिनल रिकॉर्ड से उनकी नौकरी जाती रही। एक क्रिमिनल रिकॉर्ड से भविष्य में नौकरी की संभावनाएं प्रश्नचिह्नित हो गयीं।
आप जिन उपकरणों से समाज में न्याय लाने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें मुस्कुराते चेहरों की कुछ फीकी पड़ चुकी तस्वीरें थामे हुई हैं।
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड सीनियर ऑफिसर हैं।

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