नई दिल्ली, 3 जनवरी 2026: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम पंचायत चुनाव विवाद मामले में आज एक ऐसा फैसला दिया है कि पूरे भारत में हजारों मामलों का निपटारा हो जाएगा और भविष्य में पंचायत चुनाव के दौरान इस प्रकार की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले ही सुलट जाएगी। सुप्रीम कोर्ट का यह लैंडमार्क जजमेंट, ग्राम पंचायत की राजनीति करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को ध्यान से पढ़ना चाहिए।
संदीप सिंह बोरा बनाम नरेंद्र सिंह देवपा और अन्य
यह कहानी उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले के निर्वाचन क्षेत्र संख्या 11- भरगाँव (Bharhgaon) से शुरू होती है। उत्तराखंड राज्य चुनाव आयोग ने राज्य के 12 जिलों में पंचायत चुनाव बहाल करने के लिए 28 जून, 2025 को एक संशोधित अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना के बाद, नरेंद्र सिंह देवपा (प्रतिवादी संख्या 1) ने जिला पंचायत सदस्य के पद के लिए अपना नामांकन पत्र जमा किया।
चुनाव प्रक्रिया के दौरान, संदीप सिंह बोरा (अपीलकर्ता) ने नरेंद्र सिंह देवपा के नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई। संदीप सिंह बोरा का आरोप था कि देवपा ने अपने हलफनामे में आवश्यक खुलासे नहीं किए हैं। इस आपत्ति पर विचार करने के बाद, रिटर्निंग ऑफिसर ने 9 जुलाई, 2025 को नरेंद्र सिंह देवपा की उम्मीदवारी रद्द कर दी।
मामला नैनीताल हाई कोर्ट पहुंच गया
रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले से असंतुष्ट होकर, नरेंद्र सिंह देवपा ने नैनीताल स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय में रिट याचिका (Writ Petition (MS) No. 2083 of 2025) दायर की। दिनांक 11 जुलाई को विद्वान एकल न्यायाधीश ने देवपा की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। उसी दिन (11 जुलाई, 2025) निर्वाचन अधिकारी ने संदीप सिंह बोरा को जिला पंचायत सदस्य के पद पर निर्विरोध निर्वाचित (Unopposed) घोषित कर दिया, क्योंकि शेष दो उम्मीदवार (देवपा सहित) अयोग्य घोषित हो चुके थे।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने अंतरिम आदेश जारी कर दिया
देवपा ने एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ 'विशेष अपील' (Special Appeal No. 192 of 2025) दायर की। दिनांक 18 जुलाई 2025 को उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगा दी और रिटर्निंग ऑफिसर को निर्देश दिया कि वह देवपा को चुनाव चिह्न आवंटित करे और उन्हें चुनाव में भाग लेने की अनुमति दे।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और अंतिम फैसला
संदीप सिंह बोरा ने खंडपीठ के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की। दिनांक 2 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा 18 जुलाई, 2025 को पारित अंतरिम आदेश को रद कर दिया और अपील को स्वीकार कर लिया।
Legal reasons, सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला क्यों लिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में निम्नलिखित प्रमुख तर्क दिए:
1. Article 243-O: भारत के संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालती हस्तक्षेप पर स्पष्ट रोक है। चुनाव से संबंधित किसी भी शिकायत का निवारण केवल 'चुनाव याचिका' (Election Petition) के माध्यम से ही किया जा सकता है।
2. Election Petition: उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 131H में नामांकन के गलत तरीके से रद्द होने की स्थिति में चुनाव याचिका दायर करने का स्पष्ट प्रावधान है।
3. अपीलकर्ता को न सुनना: उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने संदीप सिंह बोरा को सुने बिना ही आदेश जारी कर दिया था, जबकि वे इस मामले से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे थे क्योंकि उन्हें पहले ही निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया जा चुका था।
4. चुनाव प्रक्रिया की शुचिता: कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्तिगत शिकायत के लिए पूरी चुनावी प्रक्रिया को बीच में बाधित नहीं किया जा सकता।
मामले के मुख्य पात्र और विवरण
• अपीलकर्ता: संदीप सिंह बोरा।
• मुख्य प्रतिवादी: नरेंद्र सिंह देवपा।
• न्यायाधीश (सुप्रीम कोर्ट): न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता।
• स्थान: भरगाँव निर्वाचन क्षेत्र, जिला पिथौरागढ़, उत्तराखंड।
• संबंधित कानून: भारत का संविधान (अनुच्छेद 243-O) और उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 (धारा 131H)।
अतिरिक्त जानकारी
स्रोतों के अनुसार, उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने यह माना था कि देवपा द्वारा एक पुराने आपराधिक मामले में अपनी रिहाई (Acquittal) का खुलासा न करना ऐसी कोई अयोग्यता नहीं थी जो अधिनियम की धारा 90 के दायरे में आती हो, इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई थी।
निष्कर्ष
1. जानकारी चाहिए कितनी भी छोटी हो, प्रत्याशी को उसका उल्लेख करना चाहिए। इस मामले में प्रत्याशी रिहा हो गया था। उसने सोचा विवाद खत्म तो बात खत्म, और ऐसा सोचने के कारण ही वह चुनाव के अयोग्य हो गया।
2. चुनाव प्रक्रिया को स्थगित करना अथवा चुनाव में अयोग्य घोषित उम्मीदवार को अंतरिम आदेश के माध्यम से चुनाव लड़ने की अनुमति देने का अधिकार हाईकोर्ट को नहीं है।

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