भोपाल समाचार, 15 फरवरी 2026: उज्जैन के डॉक्टर मोहन यादव भले ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए हो परंतु उनके अंदर एक खिलाड़ी, एक विद्यार्थी और ब्रह्मांड का जिज्ञासु शोधार्थी हमेशा दिखाई देता है। आज देवरा में डॉ मोहन विद्यार्थी दिखाई दिए। उन्होंने श्री राम चरित्र के लोकप्रिय व्याख्याता डॉ कुमार विश्वास से एक ऐसा प्रश्न किया, जिसका उत्तर डॉक्टर कुमार विश्वास भी नहीं दे पाए।
भगवान श्री राम के बारे में डॉक्टर मोहन यादव का प्रश्न
— Adhiraj Awasthi (@AdhirajOnline) February 15, 2026डॉ मोहन यादव ने पूछा कि, ऋषि विश्वामित्र भगवान राम को सिर्फ राक्षसों का वध करवाने के लिए महाराजा दशरथ से मांग कर ले गए थे। दोनों के बीच यहीं तक (यज्ञ-रक्षा और राक्षस-वध) की बात थी। इसके बाद भी ऋषि विश्वामित्र श्री राम को, राजा जनक के दरबार में, माता सीता के स्वयंवर में ले गए। यहां रावण सहित विश्व के तमाम शक्तिशाली राजा उपस्थित थे, और फिर परशुराम प्रसंग भी हुआ। इस घटनाक्रम से पहले श्री राम का कोई परीक्षण भी नहीं हुआ था। फिर ऋषि विश्वामित्र ने इतनी बड़ी रिस्क क्यों ली।
राजनीति में रुचि रखने वाले इस प्रश्न को नहीं समझ पाएंगे लेकिन श्री राम में रुचि रखने वाले न केवल इस प्रश्न को समझ जाएंगे, बल्कि यह भी समझ जाएंगे कि डॉक्टर मोहन यादव के अंदर वह जिज्ञासु विद्यार्थी अभी भी उतना ही अल्हड़ और नटखट है, जो अवसर पाते ही अपना प्रश्न कर डालता है।
इसके बाद डॉक्टर कुमार विश्वास ने अपने अंदाज में श्री राम चरित्र का वर्णन किया और ऋषि विश्वामित्र द्वारा महाराजा दशरथ से श्री राम को मांगे जाने के कारण की व्याख्या भी की परंतु डॉ मोहन यादव के प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए। उम्मीद अध्ययन करेंगे और भविष्य में डॉ मोहन यादव के प्रश्न का उत्तर मिलेगा।
डॉ मोहन यादव के प्रश्न का उत्तर
यह मेरी अपनी व्याख्या है, और डॉक्टर कुमार विश्वास से अलग हो सकती है लेकिन मैं यह समझता हूं कि प्रसंग इस प्रकार नहीं था जिस प्रकार घटनाक्रम घटित हुआ है बल्कि इसका उल्टा था। ऋषि विश्वामित्र को पता था कि जनकनंदिनी का स्वयंवर होने वाला है और राजा जनक "शिवधनुष" की चुनौती रखने वाले हैं। राजा जनक के दरबार में रखा शिवधनुष केवल शक्ति की नहीं, धर्म + मर्यादा + संयम की परीक्षा था।
ऋषि विश्वामित्र को इसके लिए राजा दशरथ के पुत्र श्री राम सबसे योग्य उम्मीदवार लगे, लेकिन अपनी व्यक्तिगत मान्यता से क्या होता है। इसलिए उन्होंने श्री राम की (धर्म + मर्यादा + संयम) परीक्षा का निर्णय लिया। यज्ञ-रक्षा और राक्षस-वध उसी परीक्षा का नाम है। ऋषि विश्वामित्र को पूर्ण विश्वास था कि:
- जो ताड़का का वध कर सकता है
- जो ब्रह्मास्त्र को साध सकता है
- जो गुरु आज्ञा में पूर्णतः स्थित है
- वही शिवधनुष उठा सकता है।
इसलिए यह जोखिम नहीं, बल्कि ऋषि विश्वामित्र की निश्चित योजना थी।
यह तर्क इस जानकारी के साथ ठीक प्रकार से समझ में आ जाएगा कि विश्वामित्र केवल एक ऋषि नहीं थे बल्कि भविष्यद्रष्टा तपस्वी थे। उन्हें विश्व मंच पर श्री राम का प्राकट्य करना था, और फिर श्री राम के धर्म और विनय का भी प्रदर्शन करना था। इसलिए परशुराम प्रसंग रचा।
लक्ष्मी स्वरूपा माता सीता के स्वयंवर में आयोजन की तिथि तक का निर्णय ही राजा जनक ने स्वतंत्रता पूर्वक लिया। बाकी सब कुछ ऋषि विश्वामित्र की रणनीति का हिस्सा था।
डॉ मोहन यादव को यह सब कुछ पहले से पता है लेकिन फिर भी उन्होंने श्रद्धालुओं का प्रतिनिधित्व करते हुए, मुख्य श्रद्धालु के रूप में श्री राम चरित्र के व्याख्याता से वह प्रश्न किया जिसका उत्तर श्रद्धालुओं को पता होना चाहिए और जो बात डॉ विश्वास किसी कारण से चूक जाते हैं। मेरे ख्याल से यह प्रश्न पूछ कर डॉ मोहन ने डॉक्टर विश्वास को करेक्ट किया है। उपदेश अवस्थी।

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