एक्ट्रेस प्रत्यूषा सुसाइड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिंदा बचे ब्वॉयफ्रेंड को जिम्मेदार माना, सजा सुनाई

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 17 फरवरी 2026
: साउथ इंडियन एक्ट्रेस प्रत्यूषा सुसाइड केस में सुप्रीम कोर्ट ने उसके बॉयफ्रेंड को जिम्मेदार घोषित करते हुए, सरेंडर करने का आदेश दिया है। दोनों ने एक साथ आत्महत्या का प्रयास किया था। एक्ट्रेस की मौत हो गई परंतु बॉयफ्रेंड जिंदा बच गया। उसका कहना था कि सुसाइड करने का फैसला दोनों का संयुक्त फैसला था। इसलिए वह गर्लफ्रेंड की मौत के लिए जिम्मेदार नहीं है। 

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 23 फरवरी 2002 का है, जब अभिनेत्री प्रत्यूषा और उनके प्रेमी सिद्धार्थ रेड्डी ने शादी के प्रस्ताव का विरोध होने के कारण कथित तौर पर जहर खा लिया था। अगले दिन प्रत्यूषा की अस्पताल में मृत्यु हो गई, जबकि सिद्धार्थ जीवित बच गया। प्रारंभ में, इस मामले ने काफी तूल पकड़ा क्योंकि एक डॉक्टर ने हत्या और बलात्कार की आशंका जताई थी, लेकिन बाद में सी.बी.आई. ने सिद्धार्थ के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC 306) और आत्महत्या के प्रयास (IPC 309) के तहत आरोप पत्र दायर किया।

न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष

1. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गला घोंटकर हत्या और बलात्कार के आरोप पूरी तरह से निराधार हैं। न्यायालय ने डॉ. बी. मुनि स्वामी की विवादित पोस्टमार्टम रिपोर्ट को "गैर-पेशेवर" और "त्रुटिपूर्ण" करार दिया। AIIMS की समिति और तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति की रिपोर्टों ने पुष्टि की कि प्रत्यूषा के शरीर पर मौजूद चोट के निशान इलाज की प्रक्रियाओं (Therapeutic procedures) के कारण थीं, न कि किसी शारीरिक हमले के कारण।
2. न्यायालय ने मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्यों (AP FSL और CFSL रिपोर्ट) के आधार पर माना कि मौत का कारण ऑर्गनोफॉस्फेट (नुवाक्रोन) नामक कीटनाशक का सेवन था। अस्पताल के रिकॉर्ड और डॉक्टरों की गवाही ने पुष्टि की कि भर्ती होने के समय प्रत्यूषा होश में थी और उसने खुद जहर खाने की बात स्वीकार की थी।
3. अपीलकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक 'सुसाइड पैक्ट' में जीवित बचे साथी की कानूनी जवाबदेही बनती है। 

न्यायालय के अनुसार:
• सिद्धार्थ रेड्डी ने ही वह घातक जहर और उसे खोलने के लिए चाकू खरीदा था।
• उसने प्रत्यूषा को यह कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया और जहर उपलब्ध कराकर उसकी सहायता की, जो IPC की धारा 107 के तहत 'एबेटमेंट' (उकसावा) की श्रेणी में आता है।

4. न्यायालय ने सिद्धार्थ रेड्डी के धारा 313 CrPC के तहत दिए गए बयानों पर कड़ी टिप्पणी की। रेड्डी ने प्रत्यूषा के साथ संबंधों और अस्पताल में भर्ती होने जैसी प्रमाणित सच्चाईयों से भी पूरी तरह इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि जब कोई तथ्य विशेष रूप से आरोपी की जानकारी में हो और वह उसका स्पष्टीकरण न दे, तो उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का फाइनल डिसीजन

उच्च न्यायालय ने पूर्व में सिद्धार्थ रेड्डी की सजा को घटाकर दो साल कर दिया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने उचित माना। शीर्ष अदालत ने सिद्धार्थ रेड्डी की अपील और प्रत्यूषा की मां द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका, दोनों को खारिज कर दिया।
आदेश: न्यायालय ने अपीलकर्ता सिद्धार्थ रेड्डी को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
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