राजनीति का असली चेहरा हमेशा सामने आ जाता है, लेकिन फिर भी लोग नेताओं में अपना नेतृत्व तलाशते हैं। इस व्यक्ति की मदद किसी ने नहीं की क्योंकि यह मध्य प्रदेश का वोटर नहीं है। उत्तर प्रदेश के ललितपुर का रहने वाला है लेकिन पिछले 13 साल से मध्य प्रदेश के सागर में सब्जी बेचकर गुजारा कर रहा था।
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इस दृश्य को देखने वाले लोग खुद आंसू नहीं रोक पाए
पवन साहू मूल रूप से उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के सेसाई गांव के रहने वाले हैं। पिछले 10-12 साल से वे सागर में रह रहे हैं और रोजी-रोटी के लिए सब्जी का ठेला लगाते हैं। रोजाना वे आलू, टमाटर और मौसमी सब्जियां ठेले पर लादकर बेचते हैं, ताकि परिवार का पेट भर सके।
पवन साहू पढ़े-लिखे नहीं हैं। उन्हें सरकारी सिस्टम की जानकारी नहीं है, न ही पता है कि इमरजेंसी में किसे फोन करना है या मदद कैसे मंगवानी है। उनकी पत्नी लंबे समय से बीमार चल रही थीं। परिवार की जितनी भी थोड़ी-बहुत बचत थी, वह इलाज में खर्च हो चुकी थी। शनिवार को अचानक उनकी हालत बहुत बिगड़ गई।
घर में न तो निजी वाहन था, न पैसे थे किराए की गाड़ी बुलाने के, और न ही समय पर एम्बुलेंस मिलने की उम्मीद। पवन ने पड़ोसियों के दर-दर जाकर हाथ जोड़कर मदद मांगी। उन्होंने गुहार लगाई कि कोई एम्बुलेंस के लिए फोन कर दे। लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार, किसी ने भी फोन नहीं किया। कोई आगे नहीं आया।
मजबूरन पवन ने अपनी बीमार पत्नी को गोद में उठाया और सब्जियों के ठेले पर लिटा दिया, वही ठेला जो उनका रोजगार था। वे फटी सांसों के साथ, तेजी से ठेला खींचते हुए अस्पताल की ओर चल पड़े। समय से जंग लड़ते हुए, हाथों से ठेला खींचते-खींचते वे माता मढ़िया के पास पहुंचे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रास्ते में ही उनकी पत्नी ने अंतिम सांस ली।
ठेले पर उनकी पत्नी का शव पड़ा था। पवन साहू सड़क किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे। वे बिलख-बिलख कर रो रहे थे, क्योंकि वे अस्पताल पहुंचने की पूरी कोशिश कर रहे थे, लेकिन अपनी पत्नी को बचाने में नाकाम रहे। इस दृश्य को देखने वाले कई लोग खुद आंसू नहीं रोक पाए।
पत्नी की मौत के बाद स्थानीय सामाजिक संगठन "अपना सेवा समिति" के एक वाहन ने शव को नरयावली नाका श्मशान घाट पहुंचाया, जहां अंतिम संस्कार किया गया।
सागर की मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. ममता तिमोरी ने इस मामले को संज्ञान में लिया है। उन्होंने जांच के आदेश दिए हैं कि आखिर एम्बुलेंस क्यों नहीं मिली। साथ ही प्रभावित परिवार को हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया है।
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, यह उस समाज और व्यवस्था की तस्वीर है जो गरीबों की पुकार सुनने में अक्सर देर कर देती है, और मदद तब पहुंचती है जब बहुत देर हो चुकी होती है। पवन साहू जैसे लोग रोज अपनी जिंदगी की जंग लड़ते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में उनके पास ठेला ही एकमात्र सहारा बचता है, जो कभी सब्जियां ढोता है, कभी जिंदगी की आखिरी उम्मीद बन जाता है।
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