भोपाल समाचार, 20 जनवरी 2026: University of Manchester में स्थित John Rylands Research Institute and Library में रखी गई ऐतिहासिक चिकित्सा पुस्तकों का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। बताया है कि यूरोप में, पुनर्जागरण काल में बीमारियों का इलाज करने के लिए मानव मल, छिपकली और ऐसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता था जिनके बारे में आज हम विश्वास नहीं कर सकते। इस रिसर्च रिपोर्ट को, उन लोगों को गहराई से पढ़ना चाहिए जो गोमूत्र अथवा गोबर को प्राचीन काल में चिकित्सा के लिए उपयोगी मानने से इनकार करते हैं।
पुनर्जागरण काल क्या था
जिन लोगों को नहीं पता उन्हें सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि पुनर्जागरण काल क्या है। पुनर्जागरण काल जिसे अंग्रेजी में Renaissance Period कहते हैं। लगभग 14वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक चला। यह मूल रूप से इटली के फ्लोरेंस शहर से शुरू हुआ। इतिहास में दर्द है कि इस काल में यूरोप में मध्य युग की अंधकारपूर्ण और संकीर्ण सोच से मुक्ति मिली एवं कला, साहित्य, विज्ञान और खोजों का एक नया युग शुरू हुआ।
वैज्ञानिक कौन है और उनकी खोज का कितना महत्व है
यह जानना भी जरूरी है कि खोज करने वाला व्यक्ति कौन है। और उसके द्वारा की गई खोज का कितना महत्व है। इस शोध के पीछे मुख्य रूप से जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ (biotechnology expert) और आविष्कारक ग्लेब ज़िलबरस्टीन (Gleb Zilberstein) और उनकी शोध टीम है। यह अध्ययन 'The American Historical Review | Oxford Academic' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस पत्रिका में किसी अध्ययन के प्रकाशित हो जाने का तात्पर्य होता है कि वह बेहद महत्वपूर्ण है। इस समाचार को पढ़ने के बाद "अध्ययन" को विस्तार से पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक का उपयोग कर सकते हैं।
6वीं सदी की चिकित्सा और अजीबोगरीब नुस्खे
वैज्ञानिकों ने पुनर्जागरण काल (Renaissance era) की चिकित्सा संबंधी दो पुरानी किताबों का विश्लेषण किया है, जिससे यह पता चला है कि उस समय के लोग बीमारियों के इलाज के लिए छिपकली के सिर और यहाँ तक कि इंसानी मल का भी इस्तेमाल करते थे। यह शोध बार्थोलोमियस वोगथर (Bartholomäus Vogtherr) द्वारा 1531 में लिखी गई दो किताबों पर आधारित है।
1. हाउ टू क्योर एंड एक्सपेल ऑल अफ्लिक्शंस
2. ए यूजफुल एंड एसेंशियल लिटिल बुक ऑफ मेडिसिन फॉर द कॉमन मैन
जॉन रायलैंड्स रिसर्च इंस्टीट्यूट एंड लाइब्रेरी, मैनचेस्टर विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई छवि
विज्ञान का नया चमत्कार: Proteomics
मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के जॉन रायलैंड्स रिसर्च इंस्टीट्यूट में रखी इन किताबों पर 16वीं और 17वीं शताब्दी के उपयोगकर्ताओं ने अपने निशानों के साथ-साथ कई रसायनों के अंश भी छोड़े थे। शोधकर्ताओं ने 'प्रोटिओमिक्स' नामक एक नई बायोकेमिकल तकनीक का उपयोग करके इन अदृश्य प्रोटीन के अंशों का विश्लेषण किया है।
जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ ग्लेब ज़िलबरस्टीन के अनुसार, जब लोग किताबों को छूते हैं, तो वे पसीने, लार और चयापचय (metabolites) के आणविक निशान छोड़ जाते हैं। वैज्ञानिकों ने विशेष प्लास्टिक डिस्क और मास स्पेक्ट्रोमेट्री की मदद से इन पन्नों से कुल 111 प्रोटीनों का पता लगाया है।
हैरान करने वाले खुलासे:
• गंजेपन का इलाज: किताबों में बाल झड़ने से रोकने के लिए यूरोपीय बीच (beech), जलकुंभी (watercress) और रोज़मेरी जैसी वनस्पतियों के निशान मिले हैं।
• इंसानी मल और छिपकली: शोध में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि गंजेपन के नुस्खे वाले पन्नों के पास मानव मल (human feces) और छिपकली के सिर के प्रोटीन मिले हैं। माना जाता है कि उस समय छिपकली के सिर के चूर्ण का उपयोग बाल उगाने के लिए किया जाता था।
• दरियाई घोड़े (Hippo) के दांत: शोधकर्ताओं को मुँह और दांतों की बीमारियों के नुस्खों के पास दरियाई घोड़े के प्रोटीन भी मिले हैं। उस समय दरियाई घोड़े के दांतों का उपयोग दांतों की समस्याओं और गुर्दे की पथरी के इलाज के लिए किया जाता था।
इतिहास को समझने का नया नजरिया
यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि सदियों पहले आम लोग किन बीमारियों से जूझ रहे थे और उनके घरेलू उपचार कितने अनोखे और वर्तमान के हिसाब से अविश्वसनीय होते थे। वैज्ञानिकों का लक्ष्य भविष्य में इस तकनीक का विस्तार करना है ताकि वे किताबों पर मौजूद डेटा के आधार पर व्यक्तिगत पाठकों की पहचान भी कर सकें।
रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी। सोर्स- The Scientific Analysis of Renaissance Recipes: Proteomics, Medicine, and the Body in the Material Renaissance जिसकी लिंक तीसरे पैराग्राफ में दी गई है।

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