उपदेश अवस्थी, 24 जनवरी 2026: सिर्फ इंदौर और मध्य प्रदेश के नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेता श्री कैलाश विजयवर्गीय आजकल पॉलिटिकल डिस्कशन का सेंट्रल टॉपिक हो गए हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि वह नाराज हैं, कुछ लोग कह रहे हैं खेल हो गया, कुछ लोग कह रहे हैं शोक में हैं और कुछ लोग कह रहे हैं कि शॉक में हैं। लेकिन मैं कहता हूं कि ऐसा कुछ भी नहीं है एक्चुअल में वह गोरिल्ला टैक्टिस बना रहे हैं। चलिए इन सारे नॉरेटिव्स और अपने पूर्वानुमान पर डिस्कस करते हैं:-
कैलाश विजयवर्गीय शोक में हैं
श्री कैलाश विजयवर्गीय से जुड़े हुए लोग इस बात का प्रमुखता से उल्लेख करते हैं कि श्री के.के. गोयल जी के साथ उनका रिश्ता, ब्लड रिलेशन से भी ज्यादा है। कहते हैं कि यदि श्री के.के. गोयल जी नहीं होते तो श्री कैलाश विजयवर्गीय राजनीति में इतने आगे तक नहीं जा पाते। श्री के.के. गोयल जी ने हजारों बार अपने व्यक्तिगत जीवन के महत्वपूर्ण कामों को स्थगित करके श्री कैलाश विजयवर्गीय का काम किया। श्री कैलाश विजयवर्गीय, इस बात को ठीक प्रकार से समझते हैं और जब अवसर आया है तो श्री कैलाश विजयवर्गीय यह स्पष्ट कर रहे हैं कि, श्री के.के. गोयल का रिश्ता उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
लेकिन यह बात लोगों को डाइजेस्ट नहीं हो रही है। लोगों का कहना है कि, श्रीमती रीना देवी गोयल जी का निधन 20 जनवरी को हुआ। राजनीति में 3 दिन का शोक पर्याप्त होता है और आजकल तो सामान्य जीवन में भी लोग 3 दिन का ही शोक रखते हैं। 24 जनवरी से सामान्य जीवन प्रारंभ होता है। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस है। एक मंत्री होने के नाते गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होना, श्री कैलाश विजयवर्गीय का राजधर्म भी है।
कैलाश विजयवर्गीय नाराज हैं
यह नॉरेटिव बिल्कुल सेट नहीं होता क्योंकि भारतीय जनता पार्टी में कोई कितना भी नाराज हो, सार्वजनिक कार्यक्रम में सामान्य शिष्टाचार का पालन हमेशा करता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो इसे गंभीर अनुशासनहीनता माना जाता है। श्री कैलाश विजयवर्गीय यह बात भली-भांति जानते हैं। उन्होंने उमा भारती एपिसोड में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा की है। इसलिए कैलाश विजयवर्गीय ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकते।
कैलाश विजयवर्गीय शॉक में हैं
दूसरा नॉरेटिव यह है कि, श्री कैलाश विजयवर्गीय शॉक में हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद उनका कोई ऐसा झटका लगा है, जिससे उबर नहीं पा रहे हैं। इसको कुछ लोग ऐसा कह रहे हैं कि, श्री कैलाश विजयवर्गीय छुट्टी पर नहीं गए हैं बल्कि छुट्टी पर भेज दिए गए हैं। लेकिन इस नेगेटिव में भी दम नहीं है क्योंकि यदि संगठन ऐसा कुछ करना भी चाहता है तो संबंधित व्यक्ति अंतिम समय तक अपने दायित्व का निर्वहन करता है। वह खुद को क्वॉरेंटाइन नहीं करता।
तो कैलाश विजयवर्गीय कर क्या रहे हैं
क्या बात हुई है, यह तो समय ही बताएगा लेकिन बात बड़ी गंभीर है यह स्पष्ट हो चुका है। श्री कैलाश विजयवर्गीय ने केवल अपने सरकारी कार्यक्रम निरस्त नहीं किए हैं बल्कि जिंदाबाद का झंडा उठाने वाले समर्थकों से मिलना भी बंद कर दिया है। राजनीति में जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति ऐसा करता है तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि वह मैदान छोड़कर भाग गया है, बल्कि कुछ और होता है। यदि यही घटनाक्रम कांग्रेस पार्टी में चल रहा होता तो इसके मतलब कुछ और होते, लेकिन यह घटना भारतीय जनता पार्टी में घटित हो रही है। इसको उनके ही चश्मे से देखना पड़ेगा।
श्री कैलाश विजयवर्गीय को पता है कि उनसे पहले के नेताओं ने जो कुछ भी किया, वह नहीं किया जा सकता है क्योंकि क्रिया और प्रतिक्रिया दोनों के उदाहरण सामने हैं। इसलिए एक नई रणनीति बनानी होगी। जैसे भारत के एक बहुचर्चित ऐतिहासिक युद्ध में, जब सामने वाले राजा के पास अत्यधिक ताकत थी, और युद्ध भूमि में लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा था तो इस कहानी के हीरो ने तकनीक का उपयोग किया। तकनीक के सामने ताकत हार गई। हीरो, अपने प्रतिस्पर्धी के समान शक्तिशाली नहीं था लेकिन फिर भी जीत गया क्योंकि उसने एक नया तरीका सोचा और पूरे रिसर्च एंड डेवलपमेंट के बाद उसको एग्जीक्यूट किया।

