जयपुर, 17 जनवरी 2026: हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की एक याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि, अनुच्छेद 226 के तहत अदालत आलसी और निष्क्रिय व्यक्तियों के प्रति उदारता दिखाने के लिए बाध्य नहीं है। इससे पहले हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हित में फैसला दिया था। कर्मचारियों ने याचिका दाखिल करके हाई कोर्ट को बताया था कि, उनके नियोक्ता विभाग ने हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया।
गजेंद्र प्रताप सिंह सहित दो अन्य बनाम अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड
राजस्थान हाई कोर्ट में गजेंद्र प्रताप सिंह सहित दो अन्य बनाम अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड मामले का फैसला विद्वान न्यायाधीश श्री आनंद शर्मा (एकल पीठ) द्वारा किया गया। श्री गजेंद्र प्रताप सिंह राजस्थान विद्युत बोर्ड में बिल डिस्ट्रीब्यूटर के पद पर नियुक्त थे। यह चतुर्थ श्रेणी का पद है। बाद में उन्हें 15% विभागीय कोटे में प्रमोशन देकर लोअर डिवीजन क्लर्क बनाया गया। इस दौरान वेतन विसंगति का मामला उपस्थित हो गया। यह विवाद Arbitration द्वारा सुलझाया गया और 20-5-1985 को मध्यस्थता अवार्ड पारित किया गया। आदेश के अनुसार वेतनमान का पुनरीक्षण किया गया। लोअर डिवीजन क्लर्क का वेतनमान ₹370–570 से बढ़ाकर ₹530–740 किया गया।
राजस्थान हाई कोर्ट में पहली याचिका
श्री गजेंद्र प्रताप सिंह सहित दो अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके दावा किया कि उनके वेतन का निर्धारण मध्यस्थता अवॉर्ड के अनुसार नहीं किया गया। उनको 559 रुपए मिलना चाहिए था जबकि उनको ₹530 न्यूनतम वेतन दिया गया।
वर्ष 1993–94 में इसी मुद्दे पर 35 याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट में दायर की गईं। इन सभी याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने 3 जून 1994 को संयुक्त रूप से फैसला दिया था जिसके अनुसार:-
- 15% विभागीय पदोन्नत LDC कर्मचारियों को उनके पूर्व क्लास-IV सेवा काल का लाभ वेतन निर्धारण में मिलेगा।
- जबकि 85% प्रत्यक्ष भर्ती LDC कर्मचारियों को पूर्व सेवा का लाभ नहीं दिया जाएगा।
- मध्यस्थता अवॉर्ड के अनुसार वेतन पुनर्निर्धारण कर एरियर और 12% ब्याज दिया जाएगा।
राजस्थान हाई कोर्ट में दूसरी याचिका
राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के 20 साल बाद, 2024 में याचिकाकर्ता ने फिर से याचिका दाखिल कर दी। कर्मचारियों का कहना था कि, हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद उन्हें पूरा लाभ नहीं दिया गया। उन्होंने कई बार विभाग को अभ्यावेदन और 2013 में कानूनी नोटिस भी दिया, लेकिन कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई।
हाईकोर्ट में विभाग का जवाब
इसके जवाब में, 1994 के फैसले का पूर्ण अनुपालन होने का दावा करते हुए अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने कहा कि याचिकाकर्ता का वेतन मध्यस्थता अवॉर्ड के अनुसार पुनर्निर्धारित किया गया था। 1 अप्रैल 1980 से याचिकाकर्ता का वेतन ₹430 तय किया गया और 1 अप्रैल 1983 से ₹520 किया गया। LDC पद पर पदोन्नति के समय आवश्यक वार्षिक वृद्धि और उच्चतर वेतनमान का लाभ भी दिया गया। निगम ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि याचिका अत्यधिक देरी से दायर की गई है।
टाइम लिमिट पर राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दिया उसके बाद विद्वान न्यायाधीश श्री आनंद शर्मा ने स्पष्ट किया कि 1994 में हाई कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला एक सामान्य निर्देश था। उस आदेश में किसी भी कर्मचारी के लिए विशेष वेतन स्तर पर निर्धन का आदेश नहीं था।
✔ हाई कोर्ट ने कहा कि अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड द्वारा शपथ पूर्वक कहा गया है कि कर्मचारियों को मध्यस्थता अवॉर्ड का लाभ दिया जा चुका है, तो हाई कोर्ट के पास कोई आधार नहीं है कि वह इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करें।
✔ विद्वान न्यायाधीश ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले के पालन के संदर्भ में, फैसले के 20 साल बाद याचिका दाखिल करना, कर्मचारी की स्थिति को कमजोर बनाता है। कर्मचारियों ने अपनी याचिका में यह भी नहीं स्पष्ट किया है कि 20 वर्ष की देरी क्यों हुई है। सुप्रीम कोर्ट के Chennai Metropolitan Water Supply & Sewerage Board बनाम T.T. Murali Babu (2014) 4 SCC 108 का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि:-
“बहुत अधिक देरी न्याय के मार्ग में बाधक है। अनुच्छेद 226 के तहत अदालत आलसी और निष्क्रिय व्यक्तियों के प्रति उदारता दिखाने के लिए बाध्य नहीं है।”
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने गजेंद्र प्रताप सिंह और मोहन लाल सैनी की याचिकाओं को खारिज कर दिया।
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