भोपाल समाचार, 24 जनवरी 2026: दोस्ती में बेईमानी हमेशा महंगी पड़ती है और यदि दोस्त गुस्सा हो जाए तो बहुत महंगी पड़ती है। आनंद मालवीय ने अपने दोस्त रमेश कुमार मेहरा को सिर्फ ₹200000 के लिए धोखा दिया। नतीजा मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और हाईकोर्ट ने आनंद मालवीय को हिरासत में लेकर जेल भेजने का आदेश दे दिया। दोनों दोस्तों के बीच यह लड़ाई 10 साल तक चली और वह भी सिर्फ ₹200000 के लिए।
दोनों दोस्तों ने Loan Agreement भी साइन किया था
तो इस कहानी के किरदार रमेश कुमार मेहरा और आनंद मालवीय को आप पहचान ही चुके होंगे। दोनों के बीच अच्छे पारिवारिक संबंध थे। आनंद मालवीय को अपनी व्यक्तिगत काम के लिए ₹200000 की जरूरत पड़ी। दोस्ती के नाते रमेश कुमार मेहरा ने बिना ब्याज के ₹200000 उधार दे दिए। लेनदेन 24 अप्रैल 2015 को हुआ। दोनों ने Loan Agreement पर साइन किया। इसमें स्पष्ट लिखा था कि 6 महीने के भीतर पैसे वापस कर दिए जाएंगे। गारंटी के तौर पर 1-1 लाख रुपए के दो चेक लगाए गए थे।
रमेश कुमार मेहरा बनाम आनंद मालवीय Criminal Appeal No. 7768 of 2019
जब 6 महीने बाद रमेश ने पैसे मांगे, तो आरोपी ने चेक दिए (या समझौते के अनुसार वे देय हो गए)। रमेश ने 24 नवंबर 2015 को चेक बैंक में लगाए, लेकिन वे "अपर्याप्त धन" (insufficient funds) के कारण बाउंस हो गए। फोन पर सूचना देने पर आरोपी आनंद ने रमेश के साथ गाली-गलौज की और पैसे लौटाने से इनकार कर दिया। रमेश ने 10 दिसंबर 2015 को कानूनी नोटिस भेजा, जिसका पालन नहीं होने पर अदालत में केस दायर किया गया।
शिकायतकर्ता रमेश के वकील के यश तिवारी तर्क:
चेक केवल 'सुरक्षा' (security) के रूप में नहीं थे, बल्कि कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण को चुकाने के लिए थे।
चूंकि ऋण समझौते की तारीख पर ही आरोपी पर ₹2,00,000 का कर्ज था, इसलिए चेक का अनादर अपराध की श्रेणी में आता है।
आरोपी आनंद के वकील राहुल पटेल के तर्क:
चेक केवल 'सुरक्षा' (security) के तौर पर दिए गए थे, किसी कर्ज के भुगतान के लिए नहीं।
सुरक्षा के रूप में दिए गए चेक के बाउंस होने पर धारा 138 (N.I. Act) का अपराध नहीं बनता है।
न्यायाधीश की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
न्यायाधीश राजेंद्र कुमार वाणी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (जैसे संपल्ली सत्यनारायण राव और श्रीपति सिंह) का हवाला देते हुए निम्नलिखित बातें कहीं:
• सिक्योरिटी के रूप में जारी किया गया चेक हर परिस्थिति में एक बेकार कागज का टुकड़ा नहीं माना जा सकता।
• यदि चेक की तारीख पर कोई कानूनी ऋण अस्तित्व में है, तो धारा 138 लागू होगी।
• यदि ऋण की समय सीमा समाप्त हो गई है और भुगतान नहीं किया गया है, तो 'सुरक्षा चेक' भुगतान के लिए परिपक्व (mature) माना जाएगा और उसे बैंक में प्रस्तुत किया जा सकता है।
न्यायालय का फैसला
यह मामला परक्राम्य लिखित अधिनियम (N.I. Act) की धारा 138 के तहत था। निचली अदालत (JMFC, भोपाल): 11 मई 2018 को आरोपी आनंद मालवीय को दोषी पाया और 6 महीने की कैद तथा ₹2,40,000 मुआवजे की सजा सुनाई। अपीलीय अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया था, जिसे हाई कोर्ट ने "विकृत और अवैध" करार दिया।
हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के बरी करने के फैसले को निरस्त कर दिया और निचली अदालत की सजा (6 महीने जेल और मुआवजा) को बहाल रखा। अदालत ने आरोपी आनंद मालवीय को हिरासत में लेकर जेल भेजने का आदेश दिया।
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