भोपाल, 17 जनवरी 2026: अद्भुत भारत के दिल मध्य प्रदेश की ख़ूबसूरत धड़कती राजधानी। मॉल, मेट्रो, फ़्लायओवर, चौड़ी सड़कों पर सरपट दौड़ती कारें और ऊँची इमारतें सब मिलकर इसकी एक आधुनिक महानगर की पहचान गढ़ रहे हैं।
फिर भी, इस तमाम तेज़ रफ़्तार के बीच भोपाल आज भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, पुणे, जयपुर, हैदराबाद और हमारे अपने इंदौर की तुलना में एक हद तक slow शहर है। यहाँ ज़िंदगी अब भी अपनी ही रफ़्तार से, ख़रामा-ख़रामा चलती है।
ऑनलाइन शॉपिंग और 10 मिनट डिलीवरी के इस दौर में भी भोपाली लोग गली मोहल्लों की छोटी परचून की दुकानों और सड़कों पर लगने वाले साप्ताहिक बाज़ारों, जिन्हें हाट कहा जाता है, से ख़रीदारी करना पसंद करते हैं।ये हाट-बाज़ार रोज़मर्रा की ज़िंदगी की तमाम ज़रूरतें सहजता से मुहैया कराते हैं।
यूँ तो ये बाज़ार कुछ मध्ययुगीन से लगते हैं, पर ऑनलाइन ख़रीदारी की नीरसता से परे, यहाँ जीवन का स्पंदन है। सब्ज़ी, फल, किराना, मसाले, जूते-चप्पल, कपड़े, कम्बल, समोसे, पकौड़ी, बेचते दुकानदारों की मुस्कान; मोल-भाव की आवाज़ें; और जलेबी-की ख़ुशबू, मन को सराबोर कर देते है।
शायद यही वजह है कि तमाम आधुनिकताओं के बीच भोपाल आज भी अपनी पहचान को सहेजे हुए है। लगता है, यहाँ वक़्त कभी-कभी ठहर सा जाता है। इसी ठहराव में सहजता में बसती है भोपाल की रूह। भोपाल एक ऐसा शहर है, जो तेज़ होने की होड़ में शामिल होते हुए भी ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से जी रहा है।
ऊपरवाले से मेरी तो बस यही दुआ है कि भोपाल ऐसा ही slow शहर बना रहे। पेश-ए-ख़िदमत है, भोपाल शहर के बीचों-बीच लगे एक ऐसे ही हाट-बाज़ार की एक बानगी।
