नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026: मध्य प्रदेश की सरकारी नौकरियां एवं शिक्षा में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण विवाद के लिए सुप्रीम कोर्ट में 21 जनवरी 2026 को अंतिम सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले को लिस्ट कर लिया गया है। यह आरक्षण कानून 14 अगस्त 2019 को पारित हुआ था और तभी से विवादित है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 20 HOLD उम्मीदवारों को अपने मामले में फाइनल डिसीजन के लिए हाई कोर्ट में पिटीशन फाइल करने की स्वतंत्रता दी है।
मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण विवाद की कहानी
अधिवक्ता श्री रामेश्वर सिंह ठाकुर पिछड़ा वर्ग समुदाय का पक्ष बताते हुए कहते हैं कि, मध्य प्रदेश राज्य में ओ.बी.सी. के 27% आरक्षण का कानून विधान सभा से दिनांक 14 अगस्त 2019 को पारित हुआ था, जिसे आज दिनांक तक न तो हाईकोर्ट ने स्टे किया है और न ही सुप्रीम कोर्ट ने फिर भी मध्य प्रदेश सरकार ने विभिन्न RTI में यह कहा कि हाईकोर्ट ने याचिका क्र.18105/21 में दिनांक 4/8/23 को अंतरिम आदेश दिया पारित किया इसलिए 27% लागू नहीं किया जाएगा। जब उक्त याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज (दिनांक 28/01/2025) कर दिया तथा हाईकोर्ट के उक्त आदेश की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी तथा होल्ड अभ्यर्थियों का सरकार पर अनहोल्ड करने का दबाव बनने लगा, तो सरकार ने एक और याचिका में पारित अंतरिम आदेश दिनांक 04/05/22 का हवाला देकर पदों को अनहोल्ड नहीं करने का स्पष्टीकरण जारी किया जाने लगा।
जब उक्त याचिका क्रमांक 3668/22 के अंतरिम आदेश की व्याख्या से सरकार को अवगत कराया कि इस आदेश में भी कानून को स्टे नहीं किया गया है। तब सरकार की ओर से कहा जाने लगा कि मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं उनके शीघ्र निराकरण कराने सरकार की ओर से विशेष रूप से दो अधिवक्ता नियुक्त कराकर निराकृत कराए जाएंगे लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से निराकरण नहीं कराया जा रहा तथा बार-बार बहस के नाम पर समय लिया जा रहा है। जबकि मध्य प्रदेश सरकार के समस्त विभागों की भर्तियों में विज्ञापन ओ.बी.सी. को 27% के हिसाब से निकाले जा रहे हैं लेकिन नियुक्तियाँ मात्र 14% पदों पर ही दी जा रही हैं। तथा महाधिवक्ता के अभिमत के आधार पर 113% पर रिजल्ट जारी करके 13% ओ.बी.सी. तथा 13% सामान्य/अनारक्षित वर्ग के पदों को होल्ड किया जाकर 87% पदों पर ही नियुक्तियाँ दी जा रही हैं। होल्ड अभ्यर्थियों के न तो प्राप्तांक और न ही उनका अंतिम रिजल्ट बताया जा रहा है और न ही उनकी नियुक्ति की कोई संभावना व्यक्त की जा रही है।
पिछली दो सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उक्त सभी मामलों के अंतरिम आदेशों को निरस्त करके हाईकोर्ट को कानून की संवैधानिकता को मेरिट पर डिसाइड करने प्रत्यावर्तित (वापस भेज) कर देते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की ओर से सहमति नहीं दी गई। सरकार की सहमति इसलिए आवश्यक है कि उक्त सभी मामले मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन देकर तथा ट्रांसफर याचिकाएँ लगाकर सभी मामलों को ट्रांसफर कराने का काम किया है।
उक्त सभी मामलों में ओबीसी की ओर से पक्ष रखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है कि सरकार को ओबीसी के 27% आरक्षण लागू करने तथा पदों को अनहोल्ड करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। सरकार चाहे तो विचाराधीन याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन ओबीसी का 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने तथा होल्ड पदों को अनहोल्ड करने की कार्रवाई की जा सकती है।

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