लीगल न्यूज डेस्क, 14 नवंबर 2025: बीते गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई और न्यायमूर्ति के.विनोद चंद्रण की खंडपीठ ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि 1968 की अधिसूचना में बताए गए 126 वन खंडों वाले कुछ कम्पार्टमेंट क्षेत्र को छोड़कर तीन महीने के भीतर वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जाए। राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य के भीतर तथा उसकी सीमा से एक किलोमीटर के दायरे में खनन पूर्णतः निषिद्ध रहेगा।
राज्य सरकार यह व्यापक रूप से प्रचारित करे कि इस निर्णय से आदिवासियों या वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। वनाधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 3 और 4(1) के अंतर्गत उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। यह मामला झारखंड के सरंडा वन क्षेत्र से जुड़ा है, जो देश के सबसे सुंदर और घने साल के जंगलों में से एक है। वर्ष 1968 की अधिसूचना द्वारा 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र (लगभग 314 वर्ग किलोमीटर) को “सरंडा गेम सेंक्चुरी” घोषित किया गया था। वर्षों से यहां खनन गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय और वन्यजीव हानि की शिकायतें उठती रहीं।
2020 में डॉ. आर.के. सिंह ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण में याचिका दायर कर ईको-सेंसिटिव जोन घोषित करने की मांग की। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 12 जुलाई 2022 को झारखंड सरकार को निर्देश दिया कि वह यह तय करे कि इस क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जाना चाहिए या नहीं। झारखंड सरकार द्वारा कार्रवाई न करने पर डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव ने सर्वोच्च न्यायालय में 2024 में याचिका दायर किया था। झारखंड सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र में कोई सक्रिय खनन नहीं है। इसे “सरंडा वन्यजीव अभयारण्य” के रूप में अधिसूचित करने का प्रस्ताव दिया गया था। बाद में प्रस्ताव बढ़ाकर 57,519 हेक्टेयर किया गया, जिसमें ससंगदाबुरू कंजर्वेशन रिज़र्व भी शामिल था।
परंतु राज्य सरकार ने बार-बार अपने रुख में बदलाव किया, जिससे न्यायालय ने तीव्र असंतोष व्यक्त किया और मुख्य सचिव को व्यक्तिगत उपस्थिति होने का आदेश दिया।
न्यायालय ने कहा कि यह क्षेत्र जैवविविधता का “हॉटस्पॉट” है। यहां एशियाई हाथी, चार-सींग वाले मृग, स्लॉथ बियर, तेंदुए, गौर जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। यह क्षेत्र ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जंगलों से जुड़ा हुआ है और वन्यजीव गलियारे का हिस्सा है। वाइल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट (30 मई 2025) ने भी यह पुष्टि किया है कि यह क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वाइल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने अनुशंसा किया है कि इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जाए, क्योंकि यह सिंहभूम एलीफैंट रिजर्व का अभिन्न हिस्सा है।
राज्य सरकार ने बाद में कहा कि इस क्षेत्र में आदिवासी बस्तियां ,कृषि भूमि, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र आदि हैं। संपूर्ण क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने से खनन और रोजगार प्रभावित होंगे। नक्सल गतिविधियों की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है। राज्य ने केवल 24,941.64 हेक्टेयर को अभयारण्य घोषित करने की अनुमति मांगी थी।
अदालत ने कहा कि 1968 की अधिसूचना अब भी प्रभावी है और यह क्षेत्र पहले से ही "गेम सेंक्चुरी" घोषित है। राज्य ने अपने हलफनामों में स्वीकार किया है कि 31,468.25 हेक्टेयर में कोई खनन नहीं हो रहा है। अतः इस पूरे क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी घोषित करने में कोई बाधा नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 48 ए और 51ए(जी) के तहत राज्य का दायित्व है कि वह वन और वन्यजीव की रक्षा करे। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 18 और 26 ए के अनुसार राज्य को ऐसा क्षेत्र अधिसूचित करना ही चाहिए। राष्ट्रीय वन नीति (1988) और राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (2017–31) में यह कहा गया है कि देश के जैव विविधता क्षेत्रों को कानूनी रूप से सुरक्षित घोषित किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति एम.बी. शाह आयोग (2013) ने सारंडा में अवैध खनन से वन्यजीवों और हाथी आवास के नष्ट होने की चेतावनी दी थी और उत्पादन पर “कैपिंग” लगाने की सिफारिश की थी।खनन किसी संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र में सबसे विनाशकारी मानवीय गतिविधियों में से एक मानी जाती है।
हाथी बड़े स्तनधारी हैं जिन्हें रोज़ाना 10–20 किमी तक चलना पड़ता है। खनन पट्टे उनके पारंपरिक मार्ग काट देते हैं। परिणामस्वरूप हाथी गांवों में प्रवेश करते हैं, फसलें नष्ट होती हैं,जन–हानि की घटनाएं बढ़ती हैं। सारंडा में यही समस्या सर्वाधिक गंभीर है।कई संवेदनशील प्रजातियां खनन क्षेत्र में टिक नहीं पातीं। पक्षियों, कीटों, छोटे स्तनधारियों, सरीसृपों पर भारी प्रभाव पड़ता है। जैविक विविधता तेज़ी से घटने लगती है।अभयारण्य में खनन वन्यजीव संरक्षण, जल–स्रोत, वनस्पति, आदिवासी अधिकार, और संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर और अपरिवर्तनीय क्षति पहुंचाता है। सारंडा क्षेत्र में खनन के कारण कोइना नदी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है।इसी उपरोक्त कारणों से सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य तथा उनकी सीमा से एक किलोमीटर के भीतर खनन पर पूर्ण प्रतिबंध को पूरे देश में लागू माना है।
यह फैसला भारत में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का ऐतिहासिक निर्णय है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि “राज्य सरकारों की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण हेतु विधिक रूप से अधिसूचित करें।”
सारंडा का यह निर्णय न केवल झारखंड बल्कि पूरे भारत में वन्यजीव संरक्षण और जनजातीय अधिकारों के संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। रिपोर्ट: राज कुमार सिन्हा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ।

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