rishi panchami vrat kyu rakhte hai
आचार्य कमलांशः के अनुसार स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार स्त्री जब मासिक धर्म या रजस्ख्ला (पीरियड) में होती है तब उसे अपवित्र (संक्रमण का शिकार) माना जाता है। उस दोष निवारण हेतु वर्ष में एक बार ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। इस व्रत में सप्त ऋषि मंडल के सप्त ऋषियों का पूजन किया जाता है। जिससे उनके दोषों का निवारण होता है। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। इस बार यह व्रत दिनांक 28 अगस्त 2025 को मनाया जायगा।
Rishi panchami vrat me kya khana chahiye
भारतीय धर्म शास्त्रों में ऋषि पंचमी के दिन व्रत करने वाली महिलाओं को खेतों में उगने वाले खाद्य पदार्थ का सेवन वर्जित बताया गया है। इस दिन चाय में शक्कर वर्जित होती है क्योंकि गन्ना खेतों में उगता है। यदि टमाटर और मिर्ची आपके अपने बगीचे से नहीं है, तो उसका सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि किसान टमाटर और मिर्ची की खेती करते हैं। ऋषि पंचमी के दिन बगीचे की वनस्पति के फलों का सेवन उत्तम बताया गया है।
ऋषि पंचमी के दिन कैसे नहाना चाहिए
साथ ही यह भी मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। यदि गंगा में स्नान करना संभव नहीं है तो आप घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर स्नान कर सकते हैं।
ऋषि पंचमी व्रत कथा
विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी सुशीला रहते थे। उनकी एक पुत्री थी, जो विधवा होकर घर लौट आई। एक दिन उसकी पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए। जब उसकी माता ने यह बात अपने पति को बताई, तो उत्तंक ने समाधि लगाकर इसका कारण जाना। तब समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए धनवंतरी ऋषि ने उत्तंक को बताया कि, तेरी पुत्री रजस्ख्ला के निर्धारित नियमों का पालन नहीं करती। इसलिए वह अपवित्र (संक्रमण का शिकार) हो गई। इसके कारण ही उसके पति की मृत्यु हुई और अब यही अपवित्रता (संक्रमण) तेरी पुत्री की मृत्यु का कारण बनेगा।
जीवन में अनुशासन का पालन करने वाले ब्राह्मण उत्तंक के बार-बार निवेदन करने पर देवताओं के वैद्य धनवंतरी ने बताया कि यदि भाद्रपदशुक्ल पंचमी (ऋषि पंचमी) के दिन तेरी पुत्री सूर्य उदय से पूर्व उठकर स्नान करें। पवित्र होकर सप्त ऋषि का आह्वान करें। विधिपूर्वक उनकी स्थापना के बाद भोग और भावना समर्पण करें। एवं सप्तऋषि के समक्ष रजस्ख्ला के निर्धारित नियमों का पालन करने का संकल्प ले। तो वह पुनः स्वस्थ हो जाएगी। ब्राह्मण की कन्या ने ऋषि धनवंतरी के निर्देशानुसार वैसा ही किया और समस्त प्रकार के संक्रामक रोगों से मुक्त हो गई। तत्पश्चात उसने स्वस्थ और पूर्ण जीवन व्यतीत किया। कन्या ने अपना शेष सारा समय पृथ्वी की अन्य महिलाओं को ऋषि पंचमी के व्रत का संकल्प दिलाने और इसका महत्व समझाने में बिताया। इस प्रकार भारतवर्ष में महिलाओं को प्राण घातक संक्रमण से बचाने वाले ऋषि पंचमी व्रत की परंपरा का प्रचलन प्रारंभ हुआ।
Rishi panchami pooja vidhi
इस दिन सभी स्त्रियाँ जिन्हे मासिक धर्म आता है उन्हे यह व्रत करना चाहिये। ब्रम्हा मुहूर्त में स्नान कर एक विशिष्ट वनस्पति की दातुन से दंत्धावन करने के पश्चात सप्त ऋषियों का पूजन पाठ करना चाहिये। तत्पश्चात सात ब्राह्मणों को भोजन या फल दान करना चाहिये। इस व्रत के करने से स्त्रियों को सौभाग्य की प्राप्ति तथा दोषों से छुटकारा मिलता है।
ऋषि पंचमी व्रत का उद्यापन
जब महिला की माहवारी बंद हो जाती है उस समय किसी भी पंचमी को इस व्रत का उद्यापन किया जा सकता है। यह व्रत सभी कुआरी तथा विवाहित महिलाओं के श्रेष्ठ फलदायक है। इसे अपने सौभाग्य की वृद्धि के लिये अवश्य करना चाहिये।

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