विवाहित महिलाओं को ससुराल में आरक्षण का लाभ हेतु सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल होगी - MP NEWS

मध्य प्रदेश शासन एवं भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं के कारण विवाहित महिलाओं को ससुराल में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। श्रीमती सीमा सोनी ने इन अधिसूचनाओं के खिलाफ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी परंतु सुप्रीम कोर्ट का निर्णय होने के कारण हाईकोर्ट ने दखल देने से मना कर दिया है। उनके अधिवक्ता श्री रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कहा कि अब हम सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल करेंगे। 

महिलाओं को विवाह के बाद आरक्षण का लाभ हेतु हाईकोर्ट में याचिका

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर में श्रीमति सीमा सोनी द्वारा अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के माध्यम से याचिका क्रमांक 6700/23 दाखिल करके ओबीसी वर्ग को जति प्रमाण पत्र जारी किए जाने हेतु भारत सरकार तथा मध्य प्रदेश  सरकार की अधिसूचनाओं की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 16(2) एवं  अनुच्छेद 19(1)(e) के विरुद्ध बताया गया था। याचिकाकर्ता प्राथमिक शिक्षक के लिए ओबीसी वर्ग में चयनित हुई थी, जिसे यह कहते हुए ओबीसी के लाभ से बंचित कर दिया गया था कि राजस्थान राज्य की मूल निवासी  होने के कारण उसे मध्य प्रदेश में ओबीसी का लाभ नहीं दिया जा सकता।

सरकारी अधिसूचना में आरक्षण पर प्रतिबंध लगाया गया है

याचिका की फाइनल सुनवाई जस्टिस शील नागू तथा जस्टिस देव नारायण मिश्रा की खंड पीठ द्वारा की गई। अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक शाह ने कोर्ट को बताया कि भारत सरकार द्वारा दिनांक 18/11/1982 को एस.सी तथा एस.टी. वर्ग  सेन्ट्रल गवर्नमेंट की सेवाओं हेतु जति प्रमाण पत्र जारी किए की अधिसूचना जारी की गई है, जिसे संशोधित कर दिनांक 22/02/2018 को जारी किया गया है। मध्य प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा भारत सरकार की अधिसूचना के अनुरूप दिनांक 11/7/2005 को अनुसूचित जाति,जन जति तथा अन्य पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को जति प्रमाण पत्र जारी करने की गाइड लाइन जारी की गई। उक्त गाइडलाइन में भारत सरकार की गाइडलाइन के समान व्यवस्था की गई है। मध्य प्रदेश शासन द्वारा देय आरक्षण सुविधा की पात्रता केवल प्रदेश के मूल निवासियों को ही होंगी। 

सरकारी अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 16(2) एवं 19(1)(e) के विरुद्ध

याचिका कर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि भारत का संविधान अनुच्छेद 16(2) जति,लिंग, भाषा, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किए जाने का मौलिक अधिकार है तथा अनुच्छेद 19(1)(e) के तहत भारत के किसी भी राज्य में निवास करने का भी मौलिक अधिकार नागरिकों को दिया गया है, लेकिन भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचना 1982, 1984 एवं 2018 तथा मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन बिभेद करती है, अर्थात सोनी जाति राजस्थान एवं मध्य प्रदेश राज्य में ओबीसी की लिस्ट में अधिसूचित है, अर्थात याचिका कर्ता को मध्य प्रदेश राज्य में ओबीसी मान्य न किया जाना भेदभाव है तथा उक्त अधिसूचना तथा गाइडलाइन संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत शून्यकरणीय है। 

1982 की अधिसूचना को आज तक किसी ने चुनौती नहीं दी

अधिवक्ताओ के उक्त तर्कों से सहमत होते हुए हाईकोर्ट ने व्यक्त किया कि सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ ने भारत सरकार की उक्त अधिसूचना 1982 को आपने फैसले में रेखांकित किया है, अर्थात हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अभिमत से असंगत मत नहीं दे सकती तथा हाईकोर्ट अनुच्छेद 141 के तहत मानने को बाध्य है। तब अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर द्वारा कोर्ट को बताया गया कि आज दिनांक तक भारत सरकार की उक्त अधिसूचना 1982 की सुप्रीम कोर्ट या देश के किसी हाईकोर्ट में संवैधानिकता को चुनौती नहीं दीं गई है तथा सुप्रीम कोर्ट के आज दिनांक तक लगभग सैकड़ो जजमेंट है जिनमे उक्त अधिसूचना को रेखांकित करके फैसले पारित किए गए है। 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि हम सुनवाई नहीं कर सकते

वर्तमान याचिका क्रमांक WP/6700/23 में उक्त अधिसूचना की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है, जिस कारण उक्त फैसले हाईकोर्ट पर बंधनकारी नहीं है। उक्त प्रकरण की विस्तृत सुनवाई करके हाईकोर्ट की डिवीजन बैच ने 10 पेज का फैसला पारित कर याचिका ख़ारिज करते हुए कहा है कि, उक्त भारत सरकार की अधिसूचना 1981 तथा मध्य प्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग की गाइडलाइन में 2005 में यह न्यायलय कोई हसतेक्षेप नहीं कर सकती क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उक्त अधिसूचना के आधार पर पारित फैसला हाईकोर्ट मानने को बाध्य है। याचिका कर्ता के अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है कि हाईकोर्ट के उक्त आदेश के विरुद्ध याचिका कर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की जाएगी। 

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