पड़ोस में मंदिर निर्माण के कारण एट्रोसिटी एक्ट, सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज- DELHI NEWS

नई दिल्ली।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर दोहराया है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 को सामान्य जाति वर्ग के लोगों के खिलाफ हथियार की तरह उपयोग नहीं किया जा सकता। 

दो पक्षों के बीच दीवानी विवाद था

पी. भक्तवतचलम, जो अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित हैं, ने एक खाली भूखंड पर एक घर का निर्माण किया था। इसके बाद, उच्च जाति समुदाय के सदस्यों द्वारा उनके भूखंड के बगल में एक मंदिर का निर्माण किया जाने लगा। मंदिर के संरक्षकों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि भक्तवतचलम ने भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन करते हुए, अपने घर के भूतल और पहली मंजिलों में अनाधिकृत निर्माण कराया है। 

पड़ोस में मंदिर निर्माण से परेशानी इसलिए SC/ST ACT 

इसके जवाब में, पी. भक्तवतचलम ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर का निर्माण आम रास्ते, सीवेज और पानी की पाइपलाइनों पर अतिक्रमण करके हो रहा। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा कि उच्च जाति समुदाय के लोग सिर्फ उन्हें परेशान करने के लिए उनके घर के बगल में ​मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं। पी. भक्तवतचलम ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि उन्हें अपनी संपत्ति के शांतिपूर्ण आनंद से केवल इसलिए वंचित किया जा रहा है, क्योंकि वह एससी समुदाय से हैं।

हाईकोर्ट ने सामान्य जाति वर्ग वालों को कोई राहत नहीं दी

एग्मोर, चेन्नई की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने उन अभियुक्तों को समन भेजा, जो कथित रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के कई प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे थे। मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा समन जारी करने के खिलाफ अपील पर मद्रास हाईकोर्ट ने उच्च जाति समुदाय से आने वाले आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपील की अनुमति दी, आरोपी व्यक्तियों को जारी किए गए समन को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि विशुद्ध रूप से दीवानी विवाद के एक मामले को एससी और एसटी अधिनियम के तहत जातिगत उत्पीड़न के मामले में बदलने का प्रयास किया जा रहा है, जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।