जब पुलिस FIR दर्ज ना करें, नेता भी ना सुने तो कहां शिकायत करें, यहां पढ़िए- Legal General Knowledge

आज हम आपको कानून की ऐसी जानकारी देंगे, जिसको आम जनता की जानना बहुत जरूरी है। ज्यादातर या लगभग सभी लोग एक FIR दर्ज कराने के लिए अधिकारियों और नेताओं के सामने हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं और जब FIR दर्ज नहीं हो पाती तो उनका कानून पर से भरोसा उठ जाता है, परंतु हम बताना चाहते हैं कि न्यायपालिका का गठन इसीलिए हुआ है। पीड़ित व्यक्ति सीधे कोर्ट में शिकायत कर सकता है। आइए हम बताते हैं कि कोर्ट में शिकायत करने का तरीका क्या होता है:-

कोर्ट में परिवाद क्या होता है, कौन प्रस्तुत कर सकता है

कोर्ट में शिकायत को परिवाद कहा जाता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(घ) के अनुसार कोई भी परिवाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। परिवाद हमेशा आपराधिक मामलों में जैसे किसी भी संज्ञेय एवं असंज्ञेय अपराध में हो सकता है अर्थात किसी व्यक्ति की कोई अपराधिक मामले में FIR या शिकायत दर्ज नहीं हुई है या कोई अधिकारी शिकायत दर्ज करने में मना कर रहा है तब पीड़ित व्यक्ति इसकी शिकायत (परिवाद) डायरेक्ट मुख्य न्यागिक मजिस्ट्रेट को कर सकता हैं। ज्यादातर वकील आम बोलचाल की भाषा में इसे प्राइवेट इस्तगासा भी कहते हैं।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कौन हैं एवं कहाँ बैठता है:-

दण्ड प्रक्रिया संहिता,1973 की धारा 12 के अनुसार हाईकोर्ट द्वारा प्रत्येक जिले में एक प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की नियुक्ति देगा जो जिला न्यायालय यानी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में बैठता है। अर्थात पीड़ित व्यक्ति जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद (शिकायत) प्रस्तुत कर सकता है।

क्या कोर्ट में परिवाद प्रस्तुत करते ही FIR दर्ज हो जाती है:-

कोई भी व्यक्ति डायरेक्ट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष को लिखित या मौखिक परिवाद(शिकायत) दर्ज करता है तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट दण्ड प्रक्रिया संहिता,1973 की धारा 190(ग) के अंतर्गत अपराध पर तुरंत स्वंय संज्ञान लेगा या 190 (2) के अनुसार किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को अपराध की जांच, विचारण करने का अधिकार दे सकता है।

कुल मिलाकर परिवाद प्रस्तुत करने से न्याय की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यदि शिकायत के साथ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं है तो जांच के दौरान उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इसलिए आम नागरिक को हताश होने की आवश्यकता नहीं है। कोई भी अधिकारी या नेता, आम नागरिक को न्याय उपलब्ध कराने के लिए अंतिम व्यक्ति नहीं होता। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

:- लेखक बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665
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