जयंत मलैया भाजपा के वटवृक्ष: 35 सालों तक कोई नेता पनप नहीं पाया - MP NEWS

Bhopal Samachar
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धीरज जॉनसन।
दमोह, एक बगीचा था जिसमें से माली की नज़र बचाकर कुछ बच्चे रोज फूल तोड़ लेते थे। एक दिन माली ने उन्हें पकड़ लिया तब उनमें से एक बालक ने सोचा कि खुद को बचाना है तो आक्रमण करना चाहिए और वह चिल्लाने लगा कि अगर फूलों से खेलने ही नहीं देना तो बगीचे में लगाए ही क्यों हैं? क्या सिर्फ हमें चिढ़ाने के लिये? और वैसे भी हम फूल तोड़ें न तोड़ें वे तो मुरझाँएगे ही, कम से कम हमने उनका उपयोग तो किया! वे किसी के काम तो आए! इन तर्कों को सुन कर माली सतब्ध रह गया। 

उपचुनाव की तैयारी में लगे दमोह में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। कांग्रेस के प्रति निष्ठा जताने वाले पूर्व विधायक राहुल लोधी के भाजपा में जाने के बाद, जिस प्रकार अपने बचाव में उन्होंने मेडिकल कॉलेज को कारण बताया है और जिस प्रकार प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री उनके बचाव में आगे आए हैं वह अफसोस का विषय है। शर्मनाक इसलिए कि हमारे राजनेता अपनी गलतियों को मानकर पश्चाताप एवं सुधार करने के बजाय तर्क और दुहाई द्वारा उन्हें सही ठहराने में लग जाते हैं, पर सच्चाई नहीं बताते। अफसोस इसलिए कि चुनाव विकास एवं भ्रष्टाचार के नाम पर लड़ते हैं और समय आने पर भक्ति को ढाल बनाकर कपट की राजनीति का सहारा लेते हैं।

जब नेता सार्वजनिक जीवन में होते हैं तो सबकी निगाहें उनकी तरफ होती हैं। जिन लोगों के वोटों के सहारे वे सत्ता के शिखर तक पहुंचते हैं उनकी निगाहें उम्मीद एवं आशा से टकटकी लगाए रहती हैं। यह अत्यंत ही खेद का विषय है कि जिस कुर्सी पर बैठकर नेताओं को उससे उत्पन्न होने वाली जिम्मेदारी एवं कर्तव्य का बोध होना चाहिए आज वह कुर्सी की ताकत और उसके नशे में चूर हो जाते हैं। जो नेता जनता से, उसकी नैय्या पार लगाने का सपना दिखाकर वोट माँगते हैं वही नेता चुनाव जीतने के बाद उस आम आदमी की जरूरत पर उसका शोषण करते हैं। खेद है ऐसे समाज पर जहां ऐसा होता है और उससे भी अधिक खेद है उन लोगों पर जो ऐसे आचरण को उचित ठहराते हैं।

अब समय है व्यक्ति को अपनी ताकत पहचानने का, समय है ऐसे लोगों को पहचान कर उनको सत्य के भान का, समय है कि यदि ऐसे नेता चुनाव में खड़े होते है तो वोट की महत्ता को बताने का, समय है राजनीति में सफाई का, जो आसान तो नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। 

इधर भाजपा की सहिष्णुता भी चकित करने वाली है,पिछले 30-35 वर्षों से जिस नेता को आगे बढ़ाया और जिसके कारण कोई और नेतृत्व बढ़ नहीं पाया अब उस पर ही ध्यान नहीं रखा जा रहा है और उनके पुत्र आशीर्वाद के बहाने जनता की नब्ज टटोल रहे हैं। वक्त ऐसा पलट गया कि जयंत मलैया जो किसी समय दूसरों को टिकिट दिलाने में भी हस्तक्षेप रखते थे अब उनके पुत्र पार्टी से अलग लाइन चलाने के प्रयास में है। 

वास्तव में मलैया के सत्ता में रहते हुए स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यवस्था में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ। 2018 में चुनाव हार गए। सत्ता परिवर्तन के बाद खुशी भी कम समय के लिये रही, परम्परागत पैठ पर सांसद प्रह्लाद पटेल ने भी सेंध लगाई है। इस बीच कॉंग्रेस भी उपचुनाव की तैयारी में भटके हुए जनाधार के मध्य जाने लगी है और टिकाऊ या बिकाऊ और दल-बदल जैसी बातों के साथ न्याय और हल दिलाने की बात भी करते नजर आ रहे है।

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