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कोरोना : सर्दियों में बहुत सावधानी की जरूरत है - Pratidin

कोरोना दुष्काल में लॉक हुआ देश अनलॉक हो रहा है| अब संक्रमण गांवों में तेजी से फैल रहा है और उसे नियंत्रित करने की जरूरत है| गांव-देहात के इलाकों में संक्रमण रोकने की चुनौती और बड़ी होती जा रही है| कमोबेश पूरे देश में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी पांच मुख्य गंभीर चुनौतियां हैं| पहली, जनसंख्या के अनुपात में डॉक्टरों की कमी | आंकड़े कहते है देश में 10 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो ऐसे हैं, जहां कोई डॉक्टर नहीं हैं| 

दूसरी, अस्पतालों में बेड की की कमी| ग्रामीण इलाकों में प्रति 10000 की आबादी पर मात्र साढ़े तीन बेड ही उपलब्ध हैं, जबकि डब्ल्यूएचओ के अनुसार, प्रति 300 पर एक बेड होना चाहिए| तीसरी, ग्रामीण इलाकों में 20 प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिन्हें डॉक्टर कहा जाता है, लेकिन वे योग्यता धारक नहीं हैं| चौथी समस्या| दूरी और परिवहन| बीमार को अस्पताल तक पहुंचाना बहुत मुश्किल है| प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या जिला अस्पतालों तक मरीजों को पहुंचने में काफी समय लगता है| पांचवी और अंतिम महत्वपूर्ण बात, जागरूकता का अभाव |बीमार होने पर क्या करना है, यह पता नहीं है| सरकारी अनुमान है कि प्रवासी श्रमिकों के घर लौटने और अर्थव्यवस्था को खोलने से संक्रमण बढ़ा है| अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक बंद नहीं रखा जा सकता, हरेक को अपना जीवन चलाना है|

कहने को कुछ राज्यों में संक्रमण की दर कम होने की खबर है, लेकिन, वहां जांच कैसे और किस तरह से की जा रही है, यह भी जानना जरूरी है| इम्युनिटी को लेकर अभी स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है| कुछ देशों में इससे संबंधित कुछ रिसर्च हुई हैजिससे स्पष्ट हुआ है कि संक्रमण के बाद में शरीर में जो एंटीबॉडीज बनते हैं, वे चार से पांच महीने तक रहते हैं| ये एंटीबॉडीज कितना सुरक्षा देते हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है| स्वभाविक है अगर कहीं टेस्टिंग कम होगी, तो नंबर अपने आप ही कम हो जायेंगे| टेस्ट के बाद पॉजिटिव मामले सामने आ रहे हैं| केवल आंकड़ों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उचित रूप से टेस्टिंग हो रही है या नहीं| अच्छी दशा उसे कहा जा सकता है, जब ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग हो और उसके अनुपात में पॉजिटिव मामलों की संख्या कम मिले |

एक जाँच आरटीपीसीआर अर्थात रैपिड एंटीजन हो रही है | विशेषज्ञों की रायमें रैपिड एंटीजन में गलत मामले दर्ज होने की संभावना अधिक रहती है| आरटीपीसीआर अपेक्षाकृत महंगी और जटिल टेस्ट विधा है, इसके लिए आपको विशेषग्य और उपकरण की जरूरत होती है| ज्यादातर मामलों में जो रैपिड टेस्ट कर रहे हैं उससे मामले की यथार्थ स्थिति का आकलन नहीं हो पाता| टेस्ट किये गये मामलों में अगर पॉजिटिव मामलों की संख्या से भाग करें, तो उससे पता चलेगा कि कितने टेस्ट करने पर संक्रमण का मामला दर्ज हो रहा है|

इस बार सर्दियों के मौसम में भी संक्रमण का सामना करना हैदूसरे देशों का उदाहरण सामने है,जहां ठंड है, वहां कोविड के मामले बढ़े हैं, लेकिन वहां गंभीर मामले अधिक नहीं थे और मार्च-अप्रैल की तुलना में मौतों की संख्या कम रही| लेकिन हम दरवाजे बंद करके सारे लोग एक जगह अंगीठी के आसपास बैठेंगे, तो वहां खुली हवा नहीं होगी, जिससे संक्रमण फैलने की गुंजाइश अधिक रहेगी. खासकर उत्तर भारत में |

कई देशों में रिसर्च से पता चला है कि हर्ड इम्युनिटी नहीं बन रही है\तीन प्रतिशत, पांच प्रतिशत या 10 प्रतिशत ही एंटीबॉडीज का अनुपात आ रहा है. हर्ड इम्युनिटी के लिए यह आंकड़ा 65 से 70 प्रतिशत तक आना चाहिए, वह कहीं पर भी नहीं है| अभी स्कूल और सिनेमाघर आदि खोलने के फैसले किये गये हैं| बहुत सावधानी की जरूरत है |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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