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घर के अंदर चोरी करना और बाहर से चोरी करना, दोनों में क्या अंतर है, यहां पढ़िए - ASK IPC

कभी-कभी कुछ फिल्मों में आपने डायलॉग सुना होगा। चोरी, चोरी होती है! फिर चाहे वह छोटी हो या बड़ी लेकिन भारतीय दंड संहिता कहती है कि छोटी छोटी और बड़ी चोरी में अंतर होता है। यहां तक की घर या दुकान के अंदर से की गई चोरी और बाहर आम रास्ते से की गई चोरी में भी अंतर होता है। घर के अंदर की गई चोरी को आईपीसी की धारा 380 के तहत दर्ज किया जाता है।

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 380 की परिभाषा:-

कोई व्यक्ति ऐसे किसी निर्माण, तम्बू, मकान (घर),या जलयान में से किसी व्यक्ति की अभिरक्षा से चल संपत्ति को बिना उसकी मर्जी से ले जाता है, ऐसा करने वाला व्यक्ति धारा 380 के अंतर्गत दोषी होगा।

चोरी के अपराध की सजा में छूट:-

दण्ड संहिता की धारा 379 चोरी के अपराधों में दण्ड की बात करती है, सामान्य चोरी के लिए तीन वर्ष की कारावास या जुर्माना या दोनो से दण्डित की बात करती है।एवं इसी धारा के अनुसार आरोपी की कम आयु एवं अच्छे चरित्र के रिकॉर्ड के आधार पर उसके दण्ड में कमी की जा सकती है। एवं आरोपी को परिवीक्षा अधिनियम,1958 के अंतर्गत परिवीक्षा का लाभ देकर भी छोड़ा जा सकता है।

*उधरणानुसार वाद:- सुन्ना बनाम राज्य-*  आरोपी को एक साइकिल तथा कुछ कपड़ो की चोरी के आरोप में दण्ड संहिता की धारा-380 के अंतर्गत दोषी ठहराया गया था। न्यायालय ने आरोपी को अपराधी परिवीक्षा अधिनियम,1958 की धारा 3 के अंतर्गत परिवीक्षा का लाभ देकर छोड़ जाने का आदेश दिया क्योंकि उसके विरुद्ध कोई पहले (पूर्व में) आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था एवं उसने थोड़े लालच में आकर चोरी का अपराध किया था।

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 380 के अंतर्गत दण्ड का प्रावधान:-

इस धारा का अपराध किसी भी प्रकार से समझौता योग्य नहीं है। यह अपराध संज्ञेय(Cognizable) एवं अजमानतीय (Non-Bailable) अपराध है। इनकी सुनवाई का अधिकार किसी भी मजिस्ट्रेट(Any Magistrate) को हैं। सजा(Punishment)- सात वर्ष की कारावास और जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है।  लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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