Madhya Pradesh में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण की जरूरत नहीं; High Court में तीखी बहस

Updesh Awasthee
जबलपुर, 17 जुलाई 2026
: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने के मामले में 17 जुलाई 2026 को लगातार तीसरे दिन सुनवाई हुई। सुनवाई की शुरुआत में एक बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब ओबीसी वर्ग के अधिवक्ताओं ने पिछले दो दिनों से OBC reservation case hearing live stream बंद होने पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद कोर्ट ने लाइव कार्यवाही पुनः शुरू करने का निर्देश दिया। इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी और गोपाल शंकर नारायण ने अपनी दलीलें पूरी कीं, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती ने बहस की शुरुआत की। 

Indra Sawhney Judgment and 50 Percent Reservation Limit in India

अदालत में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 50% reservation limit in India को केवल 'असाधारण परिस्थितियों' (extraordinary situations) में ही लांघा जा सकता है। उन्होंने इंद्रा साहनी (Indra Sawhney) मामले के पैरा 810 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण की सीमा बढ़ाने की अनुमति केवल भौगोलिक रूप से दूरदराज के क्षेत्रों या राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा से बाहर रहने वाले समुदायों (जैसे अनुसूचित क्षेत्रों में एसटी) के लिए है। वकीलों ने जोर देकर कहा कि पूरे मध्य प्रदेश को 'असाधारण क्षेत्र' नहीं माना जा सकता और न ही यहाँ ऐसी स्थितियाँ हैं कि आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर जाए। 

Why Population Percentage is Not Grounds for Exceeding Reservation Ceiling

सुनवाई के दौरान population-based reservation criteria को खारिज करते हुए मराठा आरक्षण मामले (Maratha reservation case) का उदाहरण दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है कि केवल पिछड़ा वर्ग की आबादी (जैसे महाराष्ट्र में 85%) अधिक होना 'असाधारण स्थिति' नहीं है। उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि आरक्षण 70% कर दिया जाए और केवल 30% सीटें ही योग्यता (merit) के लिए बचें, तो यह समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। 

Mandatory Consultation with National Commission for Backward Classes Article 338B

कानूनी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाते हुए कोर्ट को बताया गया कि संविधान के अनुच्छेद 338-बी (Article 338-B) के तहत ओबीसी समुदाय को प्रभावित करने वाली किसी भी बड़ी नीति पर National Commission for Backward Classes से परामर्श करना अनिवार्य है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि 2019 का संशोधन कानून लाने से पहले राज्य सरकार ने इस संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया, जिससे यह कानून 'शून्य' (void) होने योग्य है। हालांकि 105वें संविधान संशोधन ने राज्यों को अपनी सूची बनाने की शक्ति दी है, लेकिन आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर ले जाने के लिए अभी भी केंद्रीय आयोग से परामर्श की आवश्यकता बनी हुई है। 

Impact of Outdated Census Data on OBC Reservation Policy in MP

राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों की प्रासंगिकता पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकार 43 साल पुरानी महाजन आयोग की रिपोर्ट (1983) और 1996-97 के पुराने आंकड़ों पर निर्भर है। उन्होंने तर्क दिया कि impact of outdated census data on reservation खतरनाक हो सकता है क्योंकि कानून बनाने के लिए समकालीन (contemporaneous) डेटा होना अनिवार्य है। कोर्ट में यह दलील दी गई कि दशकों पुराने आंकड़ों के आधार पर आरक्षण बढ़ाना 'प्रतिगामी शासन' (retrograde governance) का उदाहरण है, जो नागरिकों की प्रगति को नजरअंदाज करता है। 

Merit vs Reservation in the Age of AI and Modern Disruptors

अंत में, बहस का रुख आधुनिक चुनौतियों और merit-oriented minds in the age of AI की ओर मुड़ा। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि आज के दौर में जब दुनिया AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे 'सिविलाइजेशनल इश्यूज' का सामना कर रही है, तब देश को सबसे योग्य दिमागों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक समूहों की मांगों के आगे झुककर आरक्षण बढ़ाना संविधान के खिलाफ है। कोर्ट को बताया गया कि कई राज्यों में अब ओबीसी उम्मीदवारों के अंक सामान्य श्रेणी के बराबर या उससे अधिक आ रहे हैं, जो उनकी बढ़ती शैक्षणिक मजबूती को दर्शाता है। 

इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई अब सोमवार, 20 जुलाई 2026 को दोपहर 2:30 बजे से होगी, जहाँ वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती अपनी दलीलें जारी रखेंगे।

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