एमपी बोर्ड अपने केंद्राध्यक्ष को लावारिस छोड़ देता है, परीक्षा निष्पक्ष कैसे होगी | KHULA KHAT
       
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एमपी बोर्ड अपने केंद्राध्यक्ष को लावारिस छोड़ देता है, परीक्षा निष्पक्ष कैसे होगी | KHULA KHAT

रमेश पाटिल। माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश भोपाल मध्यप्रदेश 10वी & 12वी बोर्ड परीक्षा की गोपनीय सामग्री पुलिस अभिरक्षा से परीक्षा केन्द्र पर लाने ले जाने की व्यवस्था खुद करे क्योंकि अधिकतर खतरा केन्द्राध्यक्ष और सहायक केन्द्राध्यक्ष को यही होता है। इस कार्य हेतु शासकीय वाहन भी उपलब्ध नही कराया जाता है। वाहन सुविधा प्राप्त करने के लिए केन्द्राध्यक्ष, सहायक केन्द्राध्यक्ष की स्थिति याचक जैसी हो जाती है साथ ही कुछ भ्रष्ट लोगो के द्वारा इसी बीच गोपनीयता भंग होने की आशंका बनी रहती है। 

केन्द्राध्यक्ष, सहायक केन्द्राध्यक्ष के लिए भोजन और आवास की भी व्यवस्था माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा की जानी चाहिए, यदि केन्द्राध्यक्ष और सहायक केन्द्राध्यक्ष को विकासखंड के बाहर या 25-30 किलोमीटर से बाहर बोर्ड परीक्षा सम्पादित करने के लिए नियुक्त किया जाता है। हालांकी इन सब कार्यो के लिए मंडल मानदेय का भुगतान करता है लेकिन केवल मानदेय से ही पुलिस अभिरक्षा से गोपनीय सामग्री लाने ले जाने, भोजन और आवास की समस्या हल नही होती क्योंकि कई परीक्षा केन्द्रो का स्टाफ बेहद असहयोगी होता है और सहयोग भी करते है तो उदारता की शर्त पर।

मंडल को लगता है कि केन्द्राध्यक्ष, सहायक केन्द्राध्यक्ष की विकासखंड के बाहर नियुक्ति कर देने से बोर्ड परीक्षा एकदम निष्पक्ष सम्पन्न हो जाएगी लेकिन वास्तविकता सिद्धांत से बिल्कुल अलग होती आती है।विकासखंड के बाहर नियुक्त केन्द्राध्यक्ष, सहायक केन्द्राध्यक्ष वाहन, भोजन आवास की व्यवस्था पर दूसरो पर निर्भर होने और इन व्यवस्थाओ के लिए चिंतित होने के कारण सबसे कमजोर व्यक्ति होते है।कमजोर व्यक्तियो से निष्पक्ष परीक्षा की ज्यादा उम्मीद नही कि जा सकती?कई बार अपरिचित जगह पर अन्य प्रकार के भय पैदा करने वाले दबाव भी काम करते है।पुलिस अभिरक्षा तो गिने-चुने परीक्षा केन्द्रो को ही प्राप्त होती है।

एक सैनिक और शिक्षक की जीवन शैली में अंतर होता है। अधिकतर केन्द्राध्यक्ष सहायक केन्द्राध्यक्ष अधिक उम्र के होते है।कई शारीरिक-मानसिक दुर्बलता का शिकार होना और तत्काल चिकित्सा सुविधा की आवश्यकता वाली गंभीर बिमारी से पीडि़त होना स्वाभाविक है और उम्र का तकाजा है।हर वर्ष कुछ केन्द्राध्यक्ष या सहायक केन्द्राध्यक्ष के साथ वाहन या स्वास्थ्य सम्बन्धी घटना-दुर्घटना घटित हो जाती है।इसलिए उनसे सैनिको जैसी अपेक्षा कर वर्ष के लगभग एक माह तक बोर्ड परीक्षा के नाम पर घर परिवार से दूर मुसाफिरी का जीवन जीने के लिए बाध्य करना उचित नही है।वह परिवार का इतना महत्वपूर्ण अंग हो जाता है कि उसके बिना परिवार के सदस्य और वह परिवार के सदस्यो के बिना मानसिक-शारीरिक चिंताओ में घिर जाता है।

बोर्ड परीक्षा हर हालत में निष्पक्ष सम्पादित होनी चाहिए ताकि परीक्षार्थी, शिक्षक, विभागीय अधिकारियो और शिक्षा व्यवस्था का सही मुल्यांकन-आकलन हो सके।इसका सही तरीका है कि समस्त परीक्षा केन्द्रो पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाए और प्रत्येक कमरे के परीक्षार्थी और पर्यवेक्षक और सहायक स्टाफ पर केन्द्राध्यक्ष और सहायक केन्द्राध्यक्ष का पूरी परीक्षा के दौरान प्रत्येक गतिविधि पर पूरा नियंत्रण हो।इसकी रिकार्डिंग भी हो और रिकार्ड मंडल में जमा किया जाना अनिवार्य किया जाए।

संवेदनशील परीक्षा केन्द्रो को सीधे मंडल से लिंक किया जाए ताकि मंडल भी परीक्षा के दौरान उन परीक्षा केन्द्रो पर निगरानी कर सके।अभी परीक्षा केन्द्राध्यक्ष, सहायक केन्द्राध्यक्ष पर्यवेक्षको के भरोसे सम्पन्न करता है।जब स्वार्थ आडे आ जाते है तो भरोसा ज्यादा काम नही करता?सीसीटीवी से बडा भरोसेमंद कोई नही हो सकता क्योंकि वह मशीन होने के कारण  पक्षपात नही करती।ऐसे स्थिति में केन्द्राध्यक्ष, सहायक केन्द्राध्यक्षो को विकासखंड से बाहर भेजने की जरूरत ही नही है और न ज्यादा मानदेय प्रतिवर्ष खर्च करने की जरूरत पडेगी।

सवाल यह उठता है कि परीक्षा केन्द्रो को सीसीटीवी कैमरो से अपडेट कौन करे? बहुत ही शालाए ऐसा कहने पर ढेरो समस्याए अलग-अलग मंतव्य से बता देगी।परीक्षा केन्द्रो पर सीसीटीवी कैमरे की व्यवस्था मंडल द्वारा की जानी चाहिए।एक बार व्यय होगा लेकिन इसका उपयोग सालो-साल होगा।शालाओ को भी वर्ष भर शैक्षणिक गतिविधियो को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी।इसके रखरखाव की जिम्मेदारी शालाओ को दे दी जाए।

यकीन मानिए एक-दो वर्ष तक परीक्षा परिणाम आशा के अनुरूप न आये लेकिन उसके पश्चात शैक्षणिक स्तर भी बढेगा और परीक्षा परिणाम भी।शिक्षको में और ज्यादा मेहनत करने की जिम्मेदारी भी बढेगी।