इस मंदिर में गणेश जी की पीठ पर उल्टा स्वस्तिक बनाने से हर मनोकामना पूरी होती है | INDORE NEWS
       
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इस मंदिर में गणेश जी की पीठ पर उल्टा स्वस्तिक बनाने से हर मनोकामना पूरी होती है | INDORE NEWS

इंदौर। दुनियाभर में प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर में नववर्ष को लेकर तैयारियों जोरों पर है। इस बार यहां दो लाख के करीब  भक्तों के आने की संभावना है। पिछली बार करीब डेढ़ लाख भक्तों ने दर्शन किए थे। इस मंदिर की खासियत ये है कि यहां भगवान गणेश के साथ रिद्धी-सिद्धी की मूल प्रतिमा भगवान की मूर्ति में ही समा गई है। स्थापना के समय लगी मूर्ति का आकार बढ़कर करीब दोगुना हो गया है। इतना ही नहीं ऐसी मान्यता है कि यहां गणेशजी की पीठ पर उल्टा स्वस्तिक बनाने से होती है। 

1735 में जब खजराना गणेश की मूर्ति की स्थापना हुई थी, तब यह ढाई फीट लंबी और सवा दो फीट चौड़ी थी। इसके साथ रिद्धी और सिद्धी की प्रतिमा भी थी। अब भगवान गणेश की प्रतिमा करीब साढ़े चार फीट ऊंची और 5 फीट चौड़ी हो गई है। भगवान के साथ लगी रिद्धी और सिद्धी की मूल प्रतिमा भी भगवान की प्रतिमा में ही समा गई है। इस कारण कुछ समय पहले मंदिर में नए सिरे से इनकी मूर्तियां लगवाई गईं। मंदिर के पुजारी के मुताबिक़ हर साल भगवान की मूर्ति करीब एक सेंटीमीटर बढ़ जाती है। पिछले 284 वर्षों में इसका आकार बढ़कर दोगुना हो गया है।

मूर्ति पर रोज सवा किलो घी में आधा किलो सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाया जाता है। सिंदूर चढ़ाने की परंपरा 284 सालों से चली आ रही है। भट्ट के अनुसार रोज सुबह सवा किलो घी में आधा किलो सिन्दूर मिलाकर चोला चढ़ाया जाता है। यानी हर साल करीब 182 किलो सिंदूर और 456 किलो घी मूर्ति पर लग जाता है। खजराना गणेश मंदिर का निर्माण 1735 में तत्कालीन होल्कर वंश की शासक अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। उस समय तत्कालीन पुजारी मंगल भट्ट को स्वप्न आया कि यहां पर भगवान गणेश की मूर्ति जमीन में दबी हुई है, उसे वहां से निकालो। पुजारी ने दरबार में जाकर स्वप्न की बात अहिल्याबाई को बताई, जिसके बाद उन्होंने सेना भेजकर खुदाई शुरू करवाई।

कुछ दिन की खुदाई के बाद यहां से भगवान गणेश की मूर्ति मिली, जिसकी स्थापना करवाई गई। मूर्ति निकालने के लिए खोदी गई जगह को कुंड का रूप दिया गया। यह कुंड मंदिर के गेट पर ही है। इस मंदिर से मान्यता जुड़ी है कि गणेश जी की मूर्ति की पीठ पर उल्टा स्वस्तिक बनाने से मनोकामना पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने के बाद दोबारा मंदिर आकर सीधा स्वस्तिक बनाना होता है। एक अन्य मान्यता यह भी है कि मंदिर की तीन परिक्रमा लगाते हुए धागा बांधने से भी इच्छापूर्ति होती है।

यहां भगवान शिव और मां दुर्गा के मंदिर सहित छोटे-बड़े कुल 33 मंदिर हैं, जो अनेक देवी-देवताओ को समर्पित हैं। मंदिर परिसर में पीपल का एक प्राचीन पेड़ है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह भी मनोकामना पूर्ण करने वाला है।