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मध्यप्रदेश विधानसभा: वेश, विचार और ड्रेस | EDITORIAL by Rakesh Dubey

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन 17 दिसम्बर से प्रारम्भ हो रहा है। इस बार इस सत्र की विशेषता के लिए एक प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास के अंतर्गत गाँधी जी को स्मरण करते हुए सारे विधायक एक दिन कुर्ता- पाजामा और जाकिट धारण करेंगे। वेश से ज्यादा विचारों की निर्मलता का महत्व होता है। वेश तो नहीं ड्रेस को लेकर लोकसभा और राज्य सभा के मार्शलों की ड्रेस का मुद्दा अभी सुलझा नहीं है, मध्यप्रदेश विधानसभा के मार्शलों की खाकी वर्दी पर पुलिस के कर्मचारियों ने आपत्ति कर दी है। पुलिस मुख्यालय में चर्चित ज्ञापन में विधानसभा के मार्शलों की खाकी वर्दी का रंग बदलने की मांग की गई है।

वैसे भारत में तीन तरह की वर्दीधारी बल हैं- सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस। इनमें से हरेक बल की अपनी खासियत एवं स्पष्ट रूप से परिभाषित जिम्मेदारियां हैं। संसद और विधानसभा में मार्शलों की भूमिका इन संगठनो से इतर है। मध्यप्रदेश विधानसभा में मार्शलों के पास दो तरह की वर्दी है। एक सफेद दूसरी पुलिस से मिलती जुलती खाकी। विधानसभा सत्र के बाद भी विधानसभा के मार्शल खाकी वर्दी में मिलते है, जिससे समाज में भ्रम होता है और पुलिस इसे अपनी हेठी मानती है। सडक पर यातायात व्यवस्था या अन्य व्यवस्था में लगे पुलिस कर्मी तो कभी कभी इसे नकली पुलिस कहने तक में परहेज नहीं करते। ख़ैर।

मध्यप्रदेश पुलिस के वर्दीधारियों के इस विरोध को हाल की घटनाओं को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अन्य वर्दीधारी बलों की तुलना में आम नागरिकों के साथ करीबी संपर्क के मामले में पुलिस का काम बेहद जटिल एवं दुरुह है। इसके अलावा पुलिस के दायित्व भी एकदम अलग हैं। पुलिस के कुछ कदम अनावश्यक रूप से कठोर लग सकते हैं लेकिन इनसे बचा भी नहीं जा सकता है। भले ही आंदोलन के मुहाने पर खड़े प्रदर्शन का सामूहिक रवैया बहस का विषय हो सकता है लेकिन जिस सेना एवं अद्र्धसैनिक बलों के लिए तय मानदंड पुलिस पर नहीं लागू किए जा सकते हैं, वैसे ही मध्यप्रदेश विधानसभा को कुछ अलग मानक तय करने होंगे। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस के भीतर की शिकायत के सामने आने का यह पहला मौका है, पहले भी ऐसी बातें उठ चुकी हैं । बात आगे बढ़े इससे पहले सुधारात्मक कदम उठाए जाना चाहिए। 

सरकार का रवैया वैसे पुलिस इ साथ भी विचारणीय है पुलिस सुधारों पर विस्तृत रिपोर्ट काफी समय से सार्वजनिक विमर्श के लिए उपलब्ध हैं लेकिन उन पर अमल नहीं किया गया है। पुलिस के कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने इन सुझावों पर फौरन ध्यान देने की जरूरत बताई है। इस मामले में अगर आला अधिकारियों ने कुछ शुरुआती कदम उठाए होते तो मदद मिली होती। विधानसभा के मार्शल अपनी सेवा पुलिस के समान मान लेते है, जबकि पुलिस अलग सन्गठन है उसके काम के घंटे और अन्य सेवा शर्तें कड़ी हैं उन्हें अपनी वर्दी के हिसाब से आचरण भी करना होता है। संसदीय संगठनों में मार्शल की भूमिका अलहदा है। 

अगले सत्र का एक दिन को गाँधी जी को समर्पित करने की बात कही जा रही है। महात्मा गाँधी ने वेश से ज्यादा विचार परिवर्तन पर बल दिया है। आगामी सत्र में गाँधी के सारे पक्षों पर विधानसभा में उस दिन बात हो सकती है। दो विभिन्न विचार सदन में मार्शल की जरूरत प्रतिपादित कर सकते हैं। 
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क 9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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