खारक नदी : क्या यही है वक्त है बदलाव का ? | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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खारक नदी : क्या यही है वक्त है बदलाव का ? | EDITORIAL by Rakesh Dubey

जी, यह सब मध्यप्रदेश में हो रहा है| सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश के अनुरूप दो साल से मुआवजे के लिए संघर्ष कर रहे  खारक नदी के विस्थापितों  की मंडलेश्वर की जेल में जूते से पीटे जाने की खबर सामने आई है। सरकार अब तक इनके पुनर्वास के लिए कोई योजना नहीं बना सकी है। मंडलेश्वर जेल से सात दिन बाद रिहा होने वाले आन्दोलनकारियों ने बताया कि उनके साथ अपराधियों की तरह व्यवहार किया गया। चांटे मारे, मुर्गा बनाया, अपराधियों की तरह जूतों से पीटा। इस व्यवहार के खिलाफ भूख हड़ताल करना पड़ा। यह आन्दोलन पिछले कई वर्षों से चल रहा है। सर्वोच्च न्यायलय ने १५ जनवरी २०१७ को अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा था कि “डूब प्रभावितों का पुनर्वास तय समय सीमा में किया जाए।” इसी आदेश के अनुसार ३ सेवानिवृत्त जिला जजों द्वारा प्रत्येक परिवार के पुनर्वास का निर्धारण करना था। वैसे दावों की जांच कर सभी के लिए पुनर्वास राशि निर्धारित की गई थी,लेकिन तब शिवराज सरकार ने वह राशि भी उपलब्ध करने के लिए पहले इनकार किया और फिर डूब प्रभावितों के द्वारा आंदोलन करने पर तीन जजों के आदेश के खिलाफ एक सेवानिवृत्त जज के सामने अपील पेश कर दी। इस व्यवस्था ने प्रभावितों के पुनर्वास के हक को उलझा दिया। नई सरकार बनने के बाद आदिवासियों को उम्मीद थी कि सरकार डूब प्रभावितों को न्याय देगी और कोर्ट के आदेश का पालन करेगी। परंतु खारक बांध के प्रभावितों को जेल जाना पड़ा और जेल में उनके साथ अपराधियों से भी बदतर व्यवहार किया गया।

बांध प्रभावित आंदोलनकारी 16 दिसंबर को अपने गांवों से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचे खरगौन पहुचे थे। अगले दिन कलेक्टर ने पूरे जिले में धारा 144  लागू कर दी। इसके बाद 18 दिसंबर को आंदोलन करने पर प्रभावितों को जेल भेज दिया। उनके समर्थन में पहुंचे 30 अन्य आन्दोलनकारियों को दूसरे दिन मंडलेश्वर जेल भेजा गया। इनके साथ पुलिस व प्रशासन ने बुरा व्यवहार किया। पुलिसकर्मियों ने गालीगलौज कर उन्हें लाठियों से पीटा। किसी को थप्पड़ व डंडे मारे तो किसी को पीठ पर मारा तो किसी को मुर्गा बनाया और धमकी दी कि आंदोलन जारी रखने पर जेल जाएंगे। जेल में भी उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया।

जागृत आदिवासी दलित संगठन, जो इस लड़ाई को सडक से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ रहा है  कि माधुरी बेन ने बताया कि खारक बांध के डूब प्रभावितों को जीआरए के फैसले के बाद भी 129 लोगों को उनके हक की राशि शासन द्वारा नहीं दी जा रही है। वहीं 97 लोगों के फैसले होने के पहले ही जीआरए को भंग कर दिया गया। जबकि सुनवाई प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी थी। उनका सन्गठन डूब प्रभावित पिछले सात वर्ष से पुनर्वास नीति के अनुसार पुनर्वास किए जाने की मांग शासन से कर रहे है, लेकिन नहीं किया जा रहा है।खरगोन में १८ दिसंबर को १९७ आदिवासी किसान मजदूरों ने ‘हक नहीं तो जेल सही’ के नारे के साथ गिरफ्तारी दी है। इन १९७ लोगों में माधुरी बेन भी थी उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया। खरगोन प्रशासन ने इन सभी पर कलेक्ट्रेट में जबरन घुसने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है।मुकदमे के विचारण के पहले ही जिला और जेल प्रशसन ने जो पिटाई कर सजा दी उसकी शिकायत भी हुई, पर सुनवाई नहीं हो रही। राज्य मंत्रालय के सूत्र इस पिटाई के मामले को रद्दी को टोकरी में  जाने के संकेत दे रहे है। प्रश्न “समय है बदलाव का” का  यही अर्थ  है ?भगवानपुरा के विधायक केदार डावर ने फिर आश्वासन दिया है किवे मुख्य सचिव से मिलकर इसका हल खोजेंगे, असफल होने पर आन्दोलन के साथ खड़े होंगे।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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