दूध: सरकार आपका चेहरा भी तो स्याह है | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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दूध: सरकार आपका चेहरा भी तो स्याह है | EDITORIAL by Rakesh Dubey

भोपाल। हांडी के एक चावल की तर्ज पर एक दूध के एक टेंकर ने मध्यप्रदेश दुग्ध सहकारी संघ की अकर्मण्यता और जन स्वास्थ्य के साथ हो रहे गंभीर अपराध की पोल खोल दी है। इस एक वाकये ने साबित कर दिया है की सरकार के सहकारिता विभाग का यह उपक्रम कैसे धीमी मौत समाज को बाँट रहा है, जन सामान्य को तो दुग्ध संघ की प्रदेश में स्थित पाँचों डेयरी पर शुद्धता का अंध विश्वास था। दूध उत्पादन की सांख्यिकी और जन संख्या के बीच तालमेल नहीं है। 

जनसंख्या और पशु संख्या का अनुपात सरकार के चेहरे पर पुती स्याही सबको दिखा रहा है, सरकार देखने को तैयार नहीं है। भोपाल की इस घटना ने फिर उस बात की पुष्टि कर दी है कि देश, जिसमे मध्यप्रदेश और भोपाल भी शामिल है में 68.7 प्रतिशत दूध और दूध से बने उत्पाद नकली है। अब बात दूध के मूल की। राष्ट्रीय डेयरी बोर्ड के आंकड़े आज के तो उपलब्ध नहीं है सात बरस पहले के हैं तब देश में दूध देने वाली गाय की संख्या 4.1 प्रतिशत घट गई थी, बकरी की संख्या भी 3.8 प्रतिशत घट गई थी भैंस की संख्या में जरुर कुछ प्रतिशत का इजाफा हुआ था। इसके विपरीत दूध के उपभोक्ता लाखों में बड़े। यही हाल मध्यप्रदेश में हुआ गाय भैंस दोनों घटी उपभोक्ता बड़े और उत्पादन भी बड़ा कैसे? 

इस बढती मांग और लालच ने नकली दूध बनाया जो बिना परीक्षण के सहकारी डेयरी के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुंचा और अब भी पहुंच रहा है। इस लाभकारी धंधे से प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री तक जुड़े, उन्होंने तो डेयरी को अपनी आय का साधन तक बना लिया। आज भी देश और प्रदेश दोनों में मनुष्य और दुधारू मवेशी का अनुपात कलाई खोल देता है आज़ादी के समय यह अनुपात 1:1 था अर्थात एक मनुष्य पर एक दुधारू पशु अब 8 मनुष्यों पर एक से भी कम दुधारू पशु का अनुपात है। भारी- भरकम वेतन लेने वाले बड़े अधिकारी और दुग्ध सहकारी संघों में जमे राजनेताओं को ये नगे आंकड़े नहीं दिखते? दिखते होंगे पर आँखों पर लगा सुनहरा चश्मा कुछ और दिखाता है।
 
एनीमल वेलफेयर बोर्ड के सदस्य मोहन सिंह अहलूवालिया का वो बयान याद आ रहा है कि “देश में बिकने वाला 68.7 फीसदी दूध और दूध से बना प्रोडक्ट मिलावटी है।“ यह दूध और उसके उत्पाद फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया के तय मानकों से कहीं भी मेल नहीं खाते है। आंकड़े कहते है मिलावट वाले करीब 89 प्रतिशत उत्पाद में एक या दो तरह की मिलावट होती है। 31मार्च 2018 देश में दूध का कुल उत्पादन 14.68 करोड़ लीटर रोजाना रिकॉर्ड किया गया, जबकि देश में दूध की प्रति व्यक्ति खपत 480 ग्राम प्रति दिन होती है। सीधे तौर पर यह अंतर करीब 68 प्रतिशत का है।जिसकी पूर्ति बाज़ार में मौजूद नकली-असली दूध करता है।

दक्षिणी राज्यों के मुकाबले उत्तरी राज्यों में दूध में मिलावट के ज्यादा मामले सामने आए हैं। दूध में मिलावट को लेकर कुछ साल पहे देश में एक सर्वे हुआ था। इसमें पाया गया कि दूध को पैक करते वक्त सफाई और स्वच्छता दोनों से खिलवाड़ किया जा रहा है। दूध में डिटर्जेंट की सीधे तौर पर मिलावट पाई गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दूध में मिलावट के खिलाफ हाल ही में भारत सरकार के लिए एडवायजरी जारी की है। इसमें कहा गया कि अगर दूध औ दूध से बने प्रोडक्ट में मिलावट पर लगाम नहीं लगाई गई तो देश की करीब 87 प्रतिशत आबादी 2025 तक कैंसर जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी का शिकार हो सकती है।

केंद्र सरकार ने स्व अरुण जेटली के अध्यक्षता में मिलावट पर विचार के लिए एक समिति भी बनाई थी, उसकी रिपोर्ट कहाँ है कुछ पता नहीं। मध्यप्रदेश में “शुद्ध के लिए युद्ध” के पहले ही दिन दूध को लेकर सहकारी/सरकारी चेहरा सामने आया है। और भी कई उत्पाद है। डरता हूँ कल एक व्यापारी भाई की कही बात से “ यह अभियान दो चार दिन चलेगा, फिर सब वैसा का वैसा हो जायेगा। उनकी सम्भावना गलत निकले और हम सब के जीवन से खिलवाड़ बंद हो।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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rakeshdubeyrsa@gmail.com
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