एक फैसला और आपके भीतर के गाँधी को चुनौती | EDITORIAL by Rakesh Dubey

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भोपाल। भोपाल में कल “हम सब” ने गाँधी को एक श्रंखला के अंर्तगत छठी बार याद किया। श्रंखला का उनवान है “हिंसक समय में गाँधी”। ख्यातनाम कवि राजेश जोशी ने बताया उन्होंने गाँधी को क्या समझा उनके अनुसार  आज गाँधी का नाम सुविधा का सहारा बन गया है। राजेश जोशी की इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता, गाँधी की आन्दोलनकारी प्रवृत्ति की जगह गाँधी के नाम पर होता कर्मकांड ले रहा है। देश के सामने ऐसा ही परीक्षा काल आ रहा है “राम जन्म भूमि” को लेकर, सुप्रीम कोर्ट का इस विषयक आया फैसला तय करेगा कि इस देश ने गाँधी को कितना समझा है। 

वर्षों पुराने विवाद जब सुलझ रहे होते हैं, तो अनहोनी की आशंकाएं हर तरफ सिर उठाती नजर आती हैं। इस मामले ने पहले भी कई घाव दिए हैं, इसलिए आशंकाएं उपजनी स्वाभाविक हैं। साथ ही यह सवाल उठना भी वाजिब है कि क्या गाँधी के देश के लोग इतने  परिपक्व हो चुके  है कि वह देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शांति और सम्मान के साथ स्वीकार कर लेंगे ? हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। आज के व्याख्यान की भूमिका बांधते हुए लेखक अरुण त्रिपाठी ने हाल ही में की गई उनकी अयोध्या यात्रा के बारे में जानकारी दी। उनका कहना था अयोध्या में भारी पुलिस बल है जो यहाँ-वहां बंटा हुआ है। 

सरकार को हमेशा चौकन्ना रहना चाहिए। इससे किसी को कोई गुरेज नहीं है, पर बिना किसी कारण के ऐसी कवायद भी तो हिंसा के नजदीक है। भारत की तासीर को इस समय फिर से समझना होगा यह हमारे मन में बसे गाँधी की भी परीक्षा होगी। ऐसे मौकों पर भारत की तासीर के कई उदाहरण है, जैसे  नवंबर 1984। सिख विरोधी हिंसा का भोपाल के हमीदिया रोड पर नंगा नाच हो रहा था। अगुवाई, हर 2 अक्तूबर को गाँधी श्रद्धा सुमन चढ़ाने वाले कर रहे थे। भोपाल की एक होटल श्रंखला के मालिक इस सिख परिवार के घाव अब तक हरे हैं | उस दिन गाँधी सेना के जवानों में दिखे थे, जिनकी आँखों में शोले थे पर बंदूक शांत थी। वे कर्फ्यू में घायलों को अस्पताल ले जाने वालों की मदद कर रहे थे। गाँधी सिर्फ खादी में नहीं दिखते, यदाकदा खाकी में भी दिखते हैं। 

अब बात दिल्ली की। इस दुर्घटना के बाद कुछ महीने सचमुच आश्चर्यजनक थे। दंगा पीड़ितों ने अपनी दुकानें फिर से सजा ली थीं। वे अब एक नई जिंदगी के सम्मुख ताकत और इज्जत के साथ प्रस्तुत थे। जिस भीड़ ने उन पर हमला किया था, उन्हीं में कुछ लोग अखबारों की इन पंक्तियों से शर्मिंदा महसूस कर रहे थे कि ‘पाकिस्तान से लुट-पिटकर अमन-चैन के लिए अपने देश आए लोगों को उनके ही लोगों ने लूट लिया।’ इसके बाद यह कर्मशील समाज आज फिर खड़ा है , देश के जीडीपी को बड़ा रहा है। यह अलग बात है तब हिंसा की जद में आए तमाम लोग आज भी इंसाफ का दरवाजा खटखटा रहे हैं। पिछले साल दिल्ली उच्च न्यायालय ने 88 लोगों के खिलाफ निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया था।पूर्व सांसद सज्जन कुमार दंगों के सिलसिले में आजीवन कारावास की सजा भोग रहे हैं। एक प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री को उनके ही दल के साथी डराते है | ये सब गाँधी को अपना आदर्श मानते हैं |

गाँधी का देश जब इस उपद्रव से  मुक्त होरहा था , तभी बाबरी मस्जिद का ढांचा ध्वंस हो गया। उसके बाद भी पूरे देश में दंगे भड़के। लगभग 2000 लोग मारे गए और हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई। इन दंगों की जांच के लिए गठित श्रीकृष्ण आयोग के प्रमुख न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण ने  एक इंटरव्यू में कहा था- ‘पीड़ितों की कहानियां बहुत हृदय विदारक थीं। मेरी मन:स्थिति बहुत बिगड़ गई थी। मगर जज होने के नाते लोगों की कठिनाइयां सुनने की आदत है मुझे, उस वक्त भी थी।’ यहाँ भी गाँधी के दो तरह के आराधक हैं | एक न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण जो गाँधी की तरह पीड़ा सुन दुखी थे और दूसरे .....!

अब गाँधी के देश में नये मंसूबे चल रहे हैं ‘उन लोगों’ के साथ न कोई व्यापार करेंगे और न उन्हें नौकरी देंगे। परिचितों के चेहरे बदल रहे हैं, हिंसक विभाजन की मानसिकता दरवाजा खटखटा रही है। अगर यह भाव पूरे देश में घर कर गया, तो हम न जाने कितने हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बनते देखेंगे और फिर बंटवारे के लिए किसी गाँधी को कोसंगे। अभी फैसला नहीं आया है, पर आप ने गाँधी को जितना भी समझा हो, उसे कर्मकांड से बाहर लाइए उसके सार को धारण कीजिये। इसी में हम सब का भला है।  
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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