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सिंधिया की शिकस्त के पीछे रहस्य बहुत सारे हैं | MY OPINION by Dr AJAY KHEMARIYA

डॉ अजय खेमरिया। गुना शिवपुरी से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की बड़ी हार राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में भले ही मोदी लहर के साथ विश्लेषित की जाए पर मप्र के लिहाज से गुना में सिंधिया की हार एक ऐसे तिलिस्म के टूटने जैसा है जिसे राजशाही औऱ लोकशाही के अद्भुत औऱ अभेद्य दुर्ग के रूप में गिना जाता रहा है। यहां पार्टियां कहीं नही है। सिर्फ सिंधिया परिवार की जनस्वीकृति आधारित बादशाहत ही सर्वोपरि मानी जाती रही है। 

1962 से भारत की संसद में यह पहला अवसर होगा जब सिंधिया परिवार का कोई सदस्य वहां नही होगा। सवाल सिर्फ चुनावी हार का नही है। इससे बहुत आगे का है। इसमें कोई दो मत नही की सिंधिया परिवार एकमात्र ऐसा राजघराना है जो आजादी के बाद सामन्तशाही औऱ लोकशाही में अद्धभुत समन्वय बनाकर चला है। इस हार से यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या इस समन्वय के दिन अब लद रहे है? 

2014 में पार्टी पूरी ताकत से लड़ी थी

अगर ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो यह तथ्य है कि राजघराने के मौजूदा मुखिया लगातार सिंधिया परिवार की विरासत की पूंजी को गंवा रहे है हालाकि यह विश्लेषण आज भी सिंधिया परिवार को पसन्द नही आएगा लेकिन हकीकत यही है कि परिवार बदलते वक्त की नब्ज को पढ़ने में लगातार गलतियां कर रहा है। यह पिछले एक दशक से जारी है। जिसका सम्मिलित नतीजा गुना से हार के रूप में सामने आया है। बेशक देश भर की तरह यहां भी वोटिंग पैटर्न में मोदी हावी थे लेकिन 2014 में भी यहां मोदी थे वे खुद सिंधिया के खिलाफ सभा करने आये थे फिर भी जनता ने मोदी से ऊपर महाराजा को तरजीह दी। तब जबकि मप्र में सरकार बीजेपी की थी। शिवराज ने 20 सभाएं ली केन्डिडेचर भी सामने पवैया जैसा था। पूरी पार्टी जीजान से बूथ पर लड़ रही थी। फिर भी सिंधिया में लोगो का भरोसा कायम रहा।

फिर 2019 में ऐसा क्या हुआ ? 

चार महीने पहले जिस सिंधिया के आह्वान पर लोगों ने विधानसभा में अंचल से बीजेपी का सफाया कर दिया उसी जनता ने सिंधिया को सवा लाख से चुनाव हरा दिया। बात आगे बढ़े इससे पहले यह भी समझना जरूरी है कि यहां देशव्यापी लहर कभी काम नही करती है। 1977 को याद कीजिये वो बदलाब का दौर जिसमे आपातकाल की यातनाएं लोगों के शरीर मे कराह रही थीं। तब भी यहाँ लोगो ने जनता पार्टी के कर्नल जीएस ढिल्लन की जगह स्व माधवराव सिंधिया को अपना प्रतिनिधि चुना। तब भी जब स्व सिंधिया ने जनसंघ को छोड़कर कांग्रेस में जाने का फैसला यह कहते हुए लिया था कि वह अपने क्षेत्र को मुख्यधारा के साथ जोड़ना चाहते हैं लोग सिंधिया परिवार के साथ चल दिये, राजमाता सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थामा हो या फिर डीपी मिश्रा की हनक मिटाने स्वतन्त्र पार्टी फिर जनसंघ/भाजपा जनता सदैव अपने पुराने राजपरिवार के साथ खड़ी रही।

रागात्मक रिश्ता था

हवाला में जब स्व सिंधिया को लपेटा गया तब भी जनता बगैर दल के राजा के साथ दिखी। यानी राजपरिवार औऱ जनता के बीच जिस अद्भुत समन्वय को हम देखते है। वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिये यहाँ अचंभा ही है। लोहिया ने रानी और मेहतरानी की समानता की थ्योरी हो या जेपी की सम्पूर्ण क्रांति, यह इलाका सबको खारिज करता रहा। राजमाता औऱ माधवराव सिंधिया के पारिवारिक मतभेद को भी जनता ने पूरी शिद्दत से सम्मान दिया और कभी इस अलगाव को अपने जनादेश से हवा देने की कोशिशें नही की। इस अकाट्य लोकतांत्रिक रिश्ते को ही हम रागात्मक रिश्ता कह सकते है। तो फिर सवाल यही है क्या यह रागात्मक रिश्ता आज दरक रहा है परिस्थितियों की इबारत तो यही कह रही है। मानना न मानना राजपरिवार के विवेक पर है।

क्या खास था राजमाता और माधवराव में 

आइये उन कारकों को तलाशे जो इस रागात्मक रिश्ते की बुनियाद है। पहली बात तो यह कि राजमाता औऱ माधवराव जी जैसी शख्सियत दुनिया मे दूसरी हो नही सकती है। दोनो का वाकई अपने इलाके से लोगो के साथ ह्रदय का रिश्ता था। जिसमें कोई नकलीपन कोई राजनीति कोई झूठ की जगह नही थी। इसे आप पीढ़ीगत रिश्ता भी कह सकते है जो परम्परागत भी था। दूसरा इन दोनों शख्सियत के जनता से रिश्ते कभी भी राजनीतिक नही रहे। दोनो जब तक जीवित रहे बहुत ही शालीनता औऱ गरिमा के साथ जिये कभी भी राजनीतिक मतभेद को जीतने के बाद लोकव्यवहार में परिलक्षित नही होने दिया लगता है। यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी जो उन्हें अपराजेय योद्धा बनाती थी। 

जनता ने कभी विकास पर सवाल नहीं किए

शायद ही किसी को याद हो कि राजमाता ने विकास के कोई बड़े काम किये हो उनके शिलान्यास के पत्थर आपको कहीं नजर नही आएंगे। राजमाता मर्त्यपर्यंत सांसद रही पर उनके विकास की कोई लड़ाई कोई सौगात का दावा उन्होंने या उनके समर्थकों ने कभी नही किया लेकिन रिश्तों की मजबूती देखिये वे अंतिम चुनाव अस्पताल से ही जीत गईं। स्व माधवराव जी भी कमोबेश इसी तरह जीतते रहे मुख्यधारा में आने की बात पर वे कांग्रेस में गए थे पर जनता ने कभी उनसे विकास पर सवाल नही किया। फिर भी वे विकास के मसीहा कहलाये। इसे आप दोनों के रिश्तों की असीम ताकत के सिवाय क्या निरूपित करेंगे?? 

अटलजी को हराया, लेकिन पूरा सम्मान करते थे

दोनों के राजनीतिक आचरण को अगर गहराई से देखे तो एक बात स्पष्ट है कि उन्होंने कभी जनता को राजनीतिक रूप से बंटने का अवसर नही दिया। आप यूट्यूब पर माधवराव जी के भाषण खंगाल लीजिये कभी उन्होंने संघ या बीजेपी के विरुद्ध कोई अमर्यादित बात नही की। 1984 में अटल जी को हराने की एक टीस उनके अंतर्मन में सदैव रही इसे मैने खुद उस वक्त समझा जब वे गुना से सांसद थे और अटल जी प्रधानमंत्री नेशनल डिफेंस मिसाइल प्रोग्राम की एक पत्रकार वार्ता में उन्होंने आलोचना की लेकिन हमसे यह भी आग्रह किया कि समाचार जारी करने से पहले एक बार उन्हें दिखा दिया जाए। प्रेमनारायण नागर इस वाकये के साक्षी हैं जब समाचार बनाकर मैंने उन्हें दिखाया तो उन्होंने अटल जी को लेकर लिखी गई एक लाइन "अटल सरकार पर हमला बोलते हुए सिंधिया ने कहा" हटवा दी और कहा कि नही अटलजी के लिये ऐसा नही लिखिये। यह उनके व्यक्तित्व का केनवास था। 

राजामाता का चश्मा भी राजनीतिक नहीं था

उन्होंने कभी संघ को लेकर कोई आपत्तिजनक बयान नही दिया तब के मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा कैलाश जोशी, सकलेचा किसी को निशाने पर नही लिया। स्थानीय स्तर पर कभी बदले की भावना से काम नही किया। यही हाल राजमाता का था दिग्गिराजा को शिवपुरी के सार्वजनिक मंच पर मुख्यमंत्री बनने के बाद उपचुनाव में विजयी भव का आशीर्वाद दिया।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने क्या गलतियां कीं

लेकिन मौजूदा सांसद इस रिश्ते औऱ एकीकृत सम्मान भाव को संजो कर नही रख पाए है। स्टेनफोर्ड की प्रबंधकीय तालीम को उन्होंने रिश्तों पर एप्लाई किया है। पूरे क्षेत्र में आज उनके विरोधियों की भरमार है। जो बड़ा तबका केवल सिंधिया देखता था उसे आपने संघी, भाजपाई में तब्दील कर दिया। इस बीच विकास के कतिथ श्रेय को लेकर भी सिंधिया ने ऐसी रेखा खुद खड़ी कर ली जिससे या तो सहमत हुआ जा सकता है या असहमत। सिंधिया ने अपने इस बार के केम्पेन में टोटल निगेटिव प्रचार किया। मोदी को ढोंगी कहा शिवराज को नकली कंस से लेकर पता नही क्या क्या उपमा दी। मांमा की छुट्टी अब नाना यानी मोदी की बारी ऐसे केम्पेन ने उनकी जमीन वहां से हिला दी। जिस पर 18 से 35 साल के 3 लाख वोटर खड़े थे। शिवराज को गाली देकर उन्होंने महल के परम्परागत किरार वोटर को नाराज कर दिया। रही सही कसर अशोक सिंह को लेकर उनकी भूमिका ने पूरी कर दी रिजल्ट इसकी खुद तस्दीक कर रहे है। इन दोनों जातियों ने सदैव महल का साथ दिया पर इस बार मोदी लहर में ये भी जुड़ गए।

प्रबन्धन की बारीकियां सामाजिक अवचेतन को पढ़कर नही बनाई जाती है यह इस चुनाव में श्री सिंधिया को समझ आ गया होगा। सच्चाई यह है कि या तो आप राजमाता या माधवराव जी की तरह रिश्तों को निभाई या फिर अपना मजबूत कैडर बनाओ। इन दोनों मोर्चो पर पूर्व सांसद विफल है। 2002 से 2019 तक गुना में कार्यकर्ताओं का कोई कैडर नही बना है। इर्दगिर्द विशुद्ध चापलूस मंडली का घेरा है जो बूथ पर नही बल्कि राजप्रसाद में ही पराक्रम दिखा सकते है। रागात्मकता की जगह भयंकर अविश्वास का नजारा होता है। सिंधिया का चुनाव प्रदेश भर के नेता चुनाव में आकर मोर्चा संभाल लेते है? क्या स्थानीय स्तर पर आप 17 साल में मजबूत फ़ॉलोअर्स खड़े नही कर पाए?? फिर जिस दल के आप नेता है उसके प्रति आपकी ईमानदारी और निष्ठा भी आज बदले वक्त में इसलिये रेखांकित होने लगी है क्योंकिं आपने क्षेत्र को बीजेपी कांग्रेस में बांटने का काम किया। 

विकास के मुद्दे पर आपकी सोच अच्छी हो सकती है पर नई पीढ़ी जमीन पर काम भी चाहती है अगर आप किसी योजना को अपनी सौगात बताने का दावा करते है तो उसके दोषपूर्ण क्रियान्वयन के खामियाजे के लिये भी तैयार रहना होगा। जमीनी जुड़ाव आपका सन्देह पैदा करता है क्योंकि आपने अपने प्रचार में बड़े बड़े होर्डिंग लगवाए टोंटी से घरों में पानी पहुचने के लोगों को यह आपके अहंकार औऱ जनता को मूर्ख समझने जैसा लगा। रिजल्ट इसकी पुष्टि करते है।विकास के मामले में गुना की हकीकत नीति आयोग की रिपोर्ट खुद बयान होती है इसलिये इस तथ्य को स्वीकार करना ही होगा कि मामला बहुत अच्छा नही है। राजनीतिक रूप से व्यक्ति चयन के मामले में भी स्व सिंधिया से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है। इमरती देवी का बचाव जिओ मोबाईल चलाने वाले नए वोटर का कतई पसन्द नही आया। कमोबेश जेएनयू कांड में कन्हैया की तरफदारी भी अंचल को नागवार गुजरी थी यह वह इलाका है जो आजादी के बाद हिन्दू महासभा का गढ़ रहा है 1962 तक।

हर सरकारी योजना को सौगात बताने पर भी नई पीढ़ी के लोग सवाल करते है। जब मोदी को भला बुरा कहा गया तब भी लोग मन बना रहे थे कुछ करने का। कांग्रेस का छोटा कार्यकर्ता कहां खड़ा है ?उसके पास क्यों हारे आपका बूथ इसका जबाब सुनने की जगह कैसे जीते अगर यह पूछा जाता तो शायद भला होता।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के इलाके में कांग्रेस कहां है? इसे ईमानदारी से विश्लेषित किया जाएगा तो बहुत से फैक्ट मिल सकते है। जनता के बीच अब कैडर ही काम करते प्रसंशक सिर्फ बैठकों में अच्छे लगते है केडर विश्वास से खड़ा होता है हवाई दौरों से नही शायद विदेशी प्रबंधकीय सिद्धान्तों में यह शामिल नही है इसे तो परिवार के पूर्वजों से ही समझा सीखा जा सकता है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य आलोचकों को बुद्धिमान राजा सदैव अतिरेक प्यार से पालता है।जो काबिल है उनकी उपयोगिता को सुनिश्चित किया जाता है क्योंकि युद्ध सैनिक ,सेनापति,लड़ते है प्रशंसक औऱ विरदावली गाने वाले दरबार की शोभा है और दरबार सैनिकों से सुरक्षित रहता है।
गुना में सिंधिया की हार मामूली नही है इसके बहुत दूरगामी औऱ दीर्धकालिक निहितार्थ है। इस रिमार्क के साथ कि बीजेपी ने अब तक के चुनावी इतिहास का सबसे कमजोर चुनाव लड़ा हर मोर्चे पर औऱ सिंधिया ने इस चुनाव को ऐसे लड़ा जैसे कोई पार्षद का निगम चुनाव लड़ता है।
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