लिच्छवि काल शासन व्यवस्था में महाअमात्य पद का अर्थ क्या था, क्या वो राजगुरू होते थे या राज ज्योतिषी - GENERAL KNOWLEDGE

Updesh Awasthee
राकेश आगरिया। ज्यादातर लोग लिच्छवि काल को नहीं समझ पाएंगे परंतु मगध और आचार्य चाणक्य को तो सभी आसानी से समझ सकते हैं। यह वही समय चक्र है जिसे लिच्छवि काल कहा जाता है। इन दिनों एक विशेष प्रकार की शासन व्यवस्था थी। पदनाम भी इसी अनुसार थे। चंद्रगुप्त और चाणक्य की कहानी में आपने 'महाअमात्य' शब्द जरूर सुना होगा। क्या आप बता सकते हैं ये 'महाअमात्य' कौन होते थे। किस व्यक्ति को 'महाअमात्य' कहा जाता था। क्या वो 'राजगुरू' होते थे या 'राज ज्योतिषी'।

हम आपको लिच्छवि काल के सभी पदनाम बताने जा रहे हैं। यह एक ऐसी रोचक जानकारी है जो इससे पहले शायद ही किसी ने प्रदान की हो। हम आपको बताते हैं कि 'महाअमात्य' का अर्थ कोई साधु, ऋषि या राजगुरू नहीं बल्कि उस राज्य के प्रधानमंत्री को कहा जाता था। अमात्य से तात्पर्य मंत्री और 'महाअमात्य' यानी प्रधानमंत्री। पढ़िए और सभी प्रकार के पदनाम।

1. महाअमात्य – प्रधानमंत्री
2. अमात्य – मंत्री
3. दुतक – सहायक मंत्री जिन्हे अब राज्यमंत्री भी कहते हैं।
4. प्रतिहार – दरबार हेर्ने
5. कुमारामात्य – मन्त्रिस्तरीय पदाधिकारी जिन्हे मंत्री के समकक्ष दर्जा कहा जाता है।
6. महासर्वदण्डनायक – प्रधान न्यायाधीश
7. सर्वदण्डनायक – न्यायाधीश
8. दण्डनायक – प्रहरी प्रमुख
9. महासामन्त – प्रमुख प्रशासक
10. महाबलाध्यक्ष – प्रधान सेनापति
11. बलाध्यक्ष – सेनापति
12. महाप्रतिहार – हजुरिया
13.प्रसाधिकृत – हाकिम
14. प्रधान सेना – नायक
15. प्रधान – ग्राम प्रशासक
16. गौल्मिक – सेना नायक
17. दौवारिक – सिपाही
18.भट – सिपाही
19. भटनायक – सिपाहियो की टुकड़ी का अध्यक्ष जिसे आप टीआई के नाम से जानते हैं।
लेखक मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक है।

भारत में लिच्छवि काल शासन व्यवस्था के दरबार का चित्रण

Licchavi Times Picture of the King's Court
इस दरबार में महाराजा की केंद्रीय भूमिका दिखाई गई है, जो स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके पास महामात्य (प्रधानमंत्री), अमात्य (मंत्री), और सेनापति (सेना प्रमुख) जैसे महत्वपूर्ण अधिकारी बैठे हैं, जो राजकीय चर्चाओं में भाग ले रहे हैं। सभा भवन वास्तुकला की दृष्टि से समृद्ध है, जिसमें नक्काशीदार लकड़ी के स्तंभ और पारंपरिक कलाकृतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा, दरबार में विदेशी राजदूत और आम नागरिकों को भी दरबार की कार्यवाही में शामिल होते हुए दिखाया गया है, जो इस काल की लोकतांत्रिक और समावेशी शासन व्यवस्था को दर्शाता है।

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