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KAMAL NATH के मनाली होटल में दहशत, करीबियों के यहां पड़ी है आयकर की रेड | NATIONAL NEWS

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के निजी सचिव आरके मिगलानी, भांजे रतुल पुरी, पूर्व ओएसडी प्रवीण कक्कड़, उनके नेटवर्क अश्विनी शर्मा एवं प्रदीप जोशी सहित कुछ कंपनियों में पड़ी आयकर की छापामार कार्रवाई की दहशत मनाली में देखी गई। यहां कमलनाथ के 5 सितारा होटल (SPAN RESORTS & SPA) में सन्नाटा नजर आया। विश्व-विख्यात पर्यटन नगरी मनाली में दिनभर अफवाहों को बाजार गरम रहा। इस होटल के मालिक कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ हैं जो छिंदवाड़ा से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। 

कमलनाथ के करीबियों के कई ठिकानों पर पड़े छापों को लेकर उनके मनाली के 14 मील स्थित पांच सितारा होटल पर भी आम और खास लोगों पर नजर गड़ी रही। होटल में सैलानियों की आवाजाही को छोड़ दिया जाए तो अन्य घटनाओं को लेकर सन्नाटा पसरा रहा। एएसपी राजकुमार चंदेल ने बताया कि इनकम टैक्स की रेड को लेकर उनके पास कोई सूचना नहीं है। बता दें कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मनाली के 14 मील में करीब तीस साल पहले एक पांच सितारा होटल का निर्माण कराया है। मनाली आने वाली बॉलीवुड हस्तियों की यह पसंदीदा जगह है।

कमलनाथ ने यहां पर होटल के पास अपने लिए एक प्राइवेट आशियाना भी सजाया था लेकिन 1995 में ब्यास नदी में आई भयंकर बाढ़ में उनका यह आशियाना बह गया। उसके बाद उनका मनाली आना जाना बहुत कम हो गया। छिंदवाड़ा से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहा उनका बेटा नकुल भी मनाली आते रहते हैं। 

कमलनाथ के होटल की कहानी

एक प्राइवेट कंपनी जिसका नाम SPAN MOTELS PRIVATE LIMITED के खिलाफ यह मामला 1995 में चला था। इस कंपनी के डायरेक्टर कमलनाथ के चिरंजीव NAKUL NATH हैं। नकुल नाथ इस कंपनी के अलावा करीब 20 कंपनियों में डायरेक्टर हैं। SPAN MOTELS PRIVATE LIMITED की संपत्तियों में SPAN RESORTS भी आता है। यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू मनाली में स्थित है। 

25 फरवरी 1995 को इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया था कि SMPL कंपनी ने अपने रिसोर्ट के फायदे के लिए ब्यास नदी की धारा को मोड़ दिया था। इसी कारण 1995 में ब्यास नदी में बाढ़ आई और बड़ा नुक्सान हुआ। बताया गया कि जिस समय नदी की धारा बदली गई कमलनाथ भारत के पर्यावरण एवं वनमंत्री थे। 

इसी मामले में 13 दिसम्बर 1996 को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। बताया गया कि दिसम्बर 1993 में हिमाचल प्रदेश सरकार के वन विभाग ने 27.2 बीघा जमीन नाथ की कंपनी को पट्टे पर दी गई थी। जनहित याचिका दायर होने के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार ने पट्टा निरस्त कर दिया एवं सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि नदियां प्राकृतिक संपत्ति हैं एवं इसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इस तरह नाथ की कंपनी ने प्रकृति में परिवर्तन करने की कोशिश की है। इसकी भरपाई के लिए नाथ की कंपनी पर जुर्माना भी लगाया गया था।