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यूबीआई: भाजपा का दांव जिसे कांग्रेस ने चल दिया | EDITORIAL by Rakesh Dubey

लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए लोकलुभावन योजनाओं के पिटारे राजनीतिक दल खोलने लगे है। नये-नये दांव आजमाए जा रहे हैं। राहुल गांधी ने न्यूनतम आय गारंटी यानी यूनिवर्सल बेसिक इंकम (यूबीआई) की बात कहकर लोकसभा चुनावों की घोषणा के पहले ही भाजपा के   इस आकर्षक दांव को हडप लिया है। अब भाजपा की बारी है। वैसे यूबीआई के बारे में प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रमण्यम ने खुद कहा था कि यह बहुत ललचाने वाली और आकर्षक योजना है। उन्होंने पिछले साल यह भविष्यवाणी की थी कि यह योजना चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा होगी।

क्या वास्तव में कांग्रेस ने इसे राजनीतिक रूप से हड़प लिया है, इसके साथ यह सवाल उठना भी लाज़मी है है कि यूबीआई किसान कर्ज़माफी और ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य के बाद बड़ा चुनावी ट्रंप कार्ड तो हो सकता है, परन्तु क्या यह वाकई गरीबों के लिये मददगार होगा? अर्थशास्त्र के जानकारों की नजर में  इस घोषणा को यूबीआई कहना ही ग़लत है। वैसे भी राहुल गांधी ने गरीबों के लिये एक योजना का ऐलान किया है। हैं ये पता कैसे लगाया जा सकता है कि जिस योजना की राहुल घोषणा कर रहे वह अगर लागू होती भी है तो कितने लोगों को कवर किया जायेगा। इस जटिल अर्थव्यवस्था उसका स्वरूप और लाभ कैसे परिभाषित होगा ? और क्या उसे यह नाम दिया जा सकेगा।

इस बात का भी कोई खुलासा नहीं है की इस योजना को लागू करने के लिये मौजूदा सब्सिडी में से कितनी कम की जायेंगी। पिछले साल दिसंबर में देश के ५० से अधिक अर्थशास्त्रियों ने वित्तमंत्री अरूण जेटली को चिट्ठी लिखकर सामाजिक सुरक्षा पेंशन और मातृत्व लाभ के वादों को पूरा करने की बात कही थी। अब राहुल गाँधी यह कह रहे है "हम जानते हैं कि २०० रुपये की पेंशन के लिये ही बुज़ुर्गों को कितने धक्के खाने पड़ रहे हैं। जबकि इस महंगाइ में २०० रूपये महीना पेंशन देना अपमानित करने जैसा है लेकिन वह भी कहां मिल रहा है।” वास्तव में सामाजिक सुरक्षा योजना कई कारणों से या तो बंट नही रही है और जहाँ मिल भी रही हैं तो तरीका ठीक नहीं है। स्थानीय संस्थाओं के कारिंदे बहुत बुरा व्यवहार करते हैं।

यह भी बहस का मुदा है कि क्या न्यूनतम आय गारंटी योजना को लागू करने के लिये पैसा कहां से आयेगा। कुछ जानकार कहते हैं कि गैर ज़रूरी सब्सिडी बन्द किया जा सकता है। ऐसी सोच रखने वाले अर्थशास्त्री खाद और पेट्रोल डीज़ल पर दी जाने वाली सब्सिडी को गैर ज़रूरी सब्सिडी मानते हैं। वहीं गरीबों को अनाज़, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को ज़रूरी सब्सिडी माना जाता है। यह परिभाषा दिल्ली स्थिति नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की एक रिपोर्ट में भी दी गई। एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि राज्य सरकारों और केंद्र की कुल सब्सिडी जहां १९८७-८८ में जीडीपी का कुल १२.९ प्रतिशत थी वहीं २०११-१२ में यह जीडीपी का १०.६ प्रतिशत रह गई है। इसी दौर में ज़रूरी सब्सिडी जीडीपी के ३.८ प्रतिशत से बढ़कर ५.६ प्रतिशत हुई और गैर ज़रूरी कहे जाने वाली सब्सिडी जीडीपी के ९.२ प्रतिशत घटकर करीब ५  प्रतिशत रह गई। वैसे यूबीआई जैसी योजना के लिये गैर ज़रूरी सब्सिडी में कमी कर पैसा जुटाया जा सकता है और यह एक बेहतर विकल्प होगा। लेकिन यह इतना सरल नहीं है और इसमें यह देखना होगा कि सरकार कितनी और कौन कौन सी सब्सिडी कम करेगी। क्या राज्य सरकारों और केंद्र के बीच कोई तालमेल बन पायेगा?
अभी तो यह एक चुनावी दांव है जिससे भाजपा चलना चाहती थी और कांग्रेस  ने चल दिया है।