जाँच से भयभीत बैंक अधिकारी, कोई उपाय ? | EDITORIAL by Rakesh Dubey

25 June 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। देश के बैंक अधिकारी नाराज़ हैं। सरकारी बैंकों के अधिकारियों की यह नाराजगी समझी जा सकती है। फंसे हुए कर्ज का आकार बढ़ता जा रहा है। फंसा हुआ कर्ज वित्त वर्ष 2018 में यह पिछले वर्ष के 80 खरब रुपये से बढ़कर 103 खरब रुपये हो गया। कुछ जांच एजेंसियों पर यह आरोप भी लगने लगा है कि ऋण देने के निर्णयों में शामिल बैंकरों के खिलाफ वे कुछ ज्यादा ही सख्ती से पेश आती हैं। उदाहरण के लिए जनवरी 2017 में आईडीबीआई बैंक के पूर्व चेयरमैन योगेश अग्रवाल तथा चार अन्य अधिकारियों को विजय माल्या के ऋण डिफॉल्ट से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया। ऐसे आरोपों का सामना कर रहे बैंक अधिकारियों की सूची दिन ब दिन लंबी होती जा रही है। सरकारी बैंकों के कम से कम पांच मुख्य अधिकारियों और ढेर सारे अन्य अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं। 

इससे कोई असहमत नहीं हो सकता है कि भ्रष्टाचार में शामिल और फंसे हुए कर्ज के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके साथ यह भी सच है कि देश के कुछ बैंकों में संचालन मानकों की हालत बहुत खराब है। यह तथ्य सामने आया है कि पंजाब नैशनल बैंक की आंतरिक जांच से पता चला कि अलग-अलग स्तरों पर उसके करीब 54 कर्मचारी उन आंतरिक फिल्टरों के टूटने के लिए जिम्मेदार थे जिनके चलते नीरव मोदी बैंक के साथ धोखाधड़ी करने में कामयाब रहा।  साथ इसके  यह मान लेना सरासर गलत है कि सभी बैंकर भ्रष्ट हैं और जब भी उनके द्वारा जारी किया गया ऋण फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो तो उन्हें सबक सिखाने की आवश्यकता है।

ऐसी कोई उचित व्यवस्था करनी होगी कि यह जांच बैंकरों की प्रताडऩा का विषय न बन जाए। आईबीए का यह कहना भी सही है कि बैंकरों के बीच भय का माहौल न बनाया जाए, क्योंकि इससे देश में बैंकिंग व्यवस्था पंगु हो जाएगी। जबकि इस वक्त ऋण वृद्घि हो रही है, ऐसा होना सही नहीं होगा। भ्रष्टाचार को बरदाश्त नहीं किया जाना चाहिए लेकिन बैंकरों को भयभीत होकर निर्णय लेने से भी नहीं रोका जाना चाहिए क्योंकि कई बार वास्तविक चूक भी जांच एजेंसियों की खोज का विषय बन जाती हैं। पीजे नायक समिति की विस्तृत अनुशंसाओं के बावजूद कहीं न कहीं कुछ कमी तो है।

भारतीय बैंक महासंघ (आईबीए) ने बैंकरों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की निंदा की है। ताज़ा गिरफ्तारी पुणे पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने बैंक आफ महाराष्ट्र के चेयरमेन सहित ५ लोगों  की है। इनका संबंध अचल संपत्ति कारोबारी डी एस कुलकर्णी को जारी किए गए एक ऋण से है जो फंसे हुए कर्ज में परिवर्तित हो चुका है। बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने कहा है कि ऋण पूरी तरह सुरक्षित है और ऋण लेने वाले को जानबूझकर देनदारी में चूक करने वाला घोषित करने और परिसंपत्तियों को वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्संरचना एवं प्रतिभूति ब्याज प्रवर्तन अधिनियम के तहत आधिपत्य में लेना दिखाता है कि बैंक प्रबंधन और कंपनी के बीच कोई मिलीभगत नहीं है। आवश्यक है कि एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाए जो बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने की प्रक्रिया को मंजूरी दे और ऐसी घटनाओं का दोहराव रोकने के दिशानिर्देश जारी करे।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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