बैंक की ब्रांच बंद, नौकरी भी जाएँगी | EDITORIAL

07 June 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। 2018 के प्रारम्भ में ही पता लग गया था कि कि चार बैंक 22 हजार करोड़ से अधिक के घाटे में चल रहे है। अब मोदी सरकार इन बैंकों के बहाने बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ा बदलाव लाने की तैयारी कर रही है। यह प्लान सफल हुआ तो भारत में स्टेट बैंक आफ इण्डिया के मुकाबले में एक और बड़ा बैंक होगा। कुछ शाखाएं बंद भी होगी और कुछ कर्मचारी भी निकाले जायेंगे।  “मेगा मर्जर प्लान” नामक इसके प्लान पर सरकार काम कर रही है। इसके तहत आईडीबीआई, ओबीसी, सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा को मिलाकर एक बड़ा बैंक बनाया जा सकता है। ऐसा होने पर यह बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बाद दूसरा बड़ा बैंक बन जाएगा। 

2018 में इन चारों बैंकों को कुल मिलाकर करीब 22 हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक ऐसी स्थिति में बैंकों की हालत सुधारने में कामयाबी मिलेगी और साथ ही कमजोर बैंकों की वित्तीय हालत में भी सुधार हो सकेगा। इन चारों बैंकों के मर्जर के बाद तैयार होने वाले नए बैंक की कुल संपत्ति 16.58 लाख करोड़ रुपये आंकी जा रही है। इतनी बड़ी एसेट के साथ नया बैंक देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक होगा। वहीं मर्जर के बाद नया बैंक अपनी संपत्ति आसानी से बेच सकेगा।

वहीं इस मेगा मर्जर से खस्ताहाल सरकारी बैंकों के हालात सुधारेंगे। कमजोर बैंक अपने एसेट बेच पाएंगे और कर्मचारियों की छंटनी में भी आसान होगी। सूत्रों के अनुसार सरकार लिहाजा केंद्र सरकार इस बैंक में लगभग 51 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी किसी निजी कंपनी को बेचने की भी तैयारी कर रही है। इस बिक्री से केंद्र सरकार को लगभग 9 से 10 हजार करोड़ रुपये जुटाने में भी मदद मिलेगी और घाटे की भरपाई की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। 

मर्जर के बाद कमजोर बैंक अपने घाटे को कम करने के लिए उन ब्रांचों को भी बंद कर पाएंगे, जहां सबसे ज्यादा घाटा उठाना पड़ रहा है। वहीं बैंक उन क्षेत्रों में अपनी शाखाओं को जारी रखते हुए विस्तार कर सकेंगे, जहां बैंक फायदे में है। इसके अलावा मर्जर के बाद बैंक अपने कर्मचारियों की छंटनी को आसानी से कर पाएंगे। बैंकों की खस्ताहालत को सुधारने के लिए केंद्र सरकार बैंकों में हिस्सेदारी बेचने पर भी विचार कर रही है। जिन चारों बैंकों के मर्जर की तैयारी की जा रही है उनमें से सबसे बुरी हालत आई डी बी आई की है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार इस बैंक में लगभग 51 फीसदी तक की हिस्सेदारी किसी निजी कंपनी को बेच सकती है। इतना ही नहीं मर्जर के बाद बैंकों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्च में भी कटौती होगी।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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