मप्र जनसंपर्क सबकी भौजाई | EDITORIAL

23 May 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। यह बात भले ही प्रदेश के एक मंत्री जी ने कल सुबह मजाक में कही थी, शाम तक सही हो गई। मंत्री जी ने कहा था कि “पत्रकार सुरक्षा की मांग करते हैं, हम जनसंपर्क में पुलिस ही  बिठा देते हैं। और यह हो गया विभागीय अधिकारियों के विरोध के चलते संचालक जनसंपर्क के ओहदे पर भारतीय पुलिस सेवा के एक अधिकारी खोजकर, पदोन्नति के साथ, बैठा दिए गये। सरकार ने अपने उस आदेश से हटकर यह निर्णय लिया है जिसके अंतर्गत उसने संचालक के दो पद बनाये थे एक जनसम्पर्क के लिए और एक माध्यम के लिए। सरकार का अधिकार है, कुछ भी करे! पर ऐसा नहीं जिससे स्थापित परम्परा ही बदल जाये। 

जनसंपर्क विभाग के इतिहास में यह पहली घटना है, जब विभाग के शीर्ष पद पर विभागीय या भारतीय प्रशासनिक सेवा से इतर अधिकारी पदस्थ हुए है। वैसे मिसाल है कि जाते-जाते मुख्यमंत्री यहाँ-वहां से खोजकर कुछ अधिकारी नीचे-ऊपर डाल गये है। सुना है कल के इस आदेश के बाद जनसंपर्क विभाग के मूल आधिकारियों ने अपनी “सविनय आपत्ति” भी दर्ज कराई है। एक जनसंपर्ककर्मी सविनय से आगे की भाषा बोल भी नहीं सकता।

सरकार उदहारण देने में माहिर होती है। इतिहास खोज कर, सरकार के शीर्ष बाबू ने दलील दी कि पहले भी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी जनसंपर्क में तैनात रहे हैं। उनकी दलील सही है, पर वो तैनाती नहीं थी दया थी। किसी पुलिस अधिकारी का परिवारजन कैंसर से जूझ रहा था तब दया के आधार मुम्बई में ऐसी कोई तैनाती विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में की गई होगी। विभागीय संवर्ग में सेंधमारी का यह दूसरा उदहारण है। पहली बार अनसुना विरोध हुआ था, पुलिस के निचले कैडर के अफसर अनुग्रहित हुए थे, अब भारतीय पुलिस सेवा के अफसर नवाजे गये हैं। इन तैनातियों के, तब और अब के कारण लगभग समान हैं।

अब  जनसंपर्क विभाग की मूल संरचना पर बात। सूचना और विशेष कर सरकारी सूचना जिसमें सरकार के कामकाज, विकास और छबि निर्माण प्रमुख है, 32 बिन्दुओं के एक चार्टर के अंतर्गत करना। मीडिया से मेलजोल रखना। विज्ञापन वितरण जैसी जटिल पहेली को सुलझाना। सरकारी प्रकाशनों का सुरुचिपूर्ण प्रकाशन। ज्ञात बातों में शामिल है। इसमें जिस प्रकार की दक्षता की  आवश्यकता होती है, वह किसी डिग्री या किसी सेवा में प्रशिक्षण से नहीं आती। इसके लिए घिसना होता है, पहले खुद लिख्खाड के रूप में, फिर किसी समाचार पत्र या मीडिया हॉउस में और फिर संचालनालय में विभिन्न विभाग के अच्छे बुरे मंत्री और अफसरों के साथ। इसके बाद पदोन्नति और अंतिम आस–सेवानिवृत्ति के पूर्व संचालक। अब रास्ते बंद दिखते हैं, अभी 2010 बैच के पुलिस अफसर आये है और भी आयेंगे । रास्ता खुल गया है, आप करते रहिये “सविनय आपत्ति” किसने रोका है। आप इंजीनियर थोड़े ही जो आन्दोलन कर अपने विभागीय शीर्ष पर अपने काडर के अफसर को बैठा सकें।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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