मीडिया को उसके धर्म का पालन करने दीजिये | EDITORIAL

Wednesday, April 4, 2018

राकेश दुबे@प्रतिदिन। आखिर प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप  के बाद फौरन सरकार ने अपने दिशा निर्देश वापिस लिए हैं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि सरकार देश में मीडिया  को स्वतंत्र मान रही है अथवा  फेक न्यूज के नाम पर मीडिया पर शिकंजा कसने का जो प्रयास किया जा रहा था, उससे मुक्ति मिल गई है। अब हालत ऐसी होगी कि “कोई मंत्री या अधिकारी कुछ बोलेगा ही नहीं” तो सूचना सूत्रों के हवाले से ही निकलेगी। हमें अनेक बार सूत्रों के हवाले से ही खबर देनी होती है। इस प्रकार की सूत्र-सूचना कई बार अधूरी हो सकती कभी-कभार गलत हो सकती है,इसका यह अर्थ नहीं कि आप उसे फेक न्यूज करार दे दे। फेक न्यूज के नाम पर उस पत्रकार की मान्यता रद्द करने का जुमला उछाल कर आप सारे मीडिया को डराने के संदेश दे रहे हैं कि मीडिया अपने आँख कान बंद रखे और अपने जनता तक सूचना पहुँचाने के धर्म का पालन न करे।

वैसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को फेक न्यूज से जुड़े दिशा-निर्देश को वापस लेने का आदेश देकर ठीक ही किया है। दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि अगर पत्रकार फेक न्यूज करते पाए गएं तो उनकी मान्यता रद्द की जा सकती हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के इन दिशा-निर्देशों की चौतरफा आलोचना हो रही थी। चिंता और आशंकाएं जताईं जा रही थीं कि नए नियमों का प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने के लिए दुरुपयोग किया जा सकता है।

सवाल यह है कि फेक न्यूज़ क्या है ? फेक न्यूज वह 'न्यूज' है जो यह जानते हुए बनाई जाती है कि यह सच नहीं है। किसी गलत रिपोर्टिंग की स्थिति में अखबार या मीडिया संस्थान उसे सही करते हैं या उसके लिए खेद प्रकट करते हैं लेकिन फेक न्यूज में ऐसा नहीं होता। फेक न्यूज संयोगवश या त्रुटिवश नहीं बनाई जाती बल्कि यह जानबूझकर की गई गलती है। यह नितांत झूठ होती है और इसका मकसद गुमराह करना होता है। जानबूझकर फेक न्यूज गढ़ने, फैलाने और अनजाने में किसी गलतीवश बिना किसी गलत मंशा के गलत रिपोर्टिंग में महत्वपूर्ण फर्क होता है। फेक न्यूज को यह पूरी तरह जानते हुए कि यह फर्जी है, जानबूझकर बनाया और फैलाया जाता है।यह देश में सर्व विदित है की ऐसी खबरों के मूल में कौन होते है और किसका हित साधन होता है | कभी-कभी न्यूज कवरेज के दौरान अनजाने में कोई गलती हो जाती है लेकिन उसके पीछे गलत मंशा नहीं होती। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि फेक न्यूज को सही-सही ढंग से परिभाषित किया जाए। द एडिटर्स गिल्ड या एनबीए इसे कर सकते हैं।  परन्तु, सरकार द्वारा यह नहीं होना चाहिए ऐसा करना गलत ही नहीं बहुत गलत है। खबर खोजना मीडिया का धर्म होता है, उसे उसके धर्म का पालन करने दीजिये।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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