मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की BHOPAL बैठक से नई रोशनी

Wednesday, September 13, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। अपनी भोपाल बैठक में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक साथ तीन तलाक को अवैध ठहराने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान लिया है। जमायत उलेमा ए हिन्द के इंकार के बाद सबकी निगाहें मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के फैसले पर टिकी थी। बोर्ड के इस औपचारिक ऐलान का इंतजार था। काफी बहस के बाद बोर्ड ने आम राय से पारित एक प्रस्ताव में माना कि एक बार में तीन तलाक गुनाह है। तीन तलाक रवायत के तौर पर कुछ मुस्लिम वर्गों में ही मान्य है ,इसलिए जमायत उलेमा ए हिंद ने अदालत का फैसला मानने से इनकार कर दिया था। वैसे अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि जमायत का रवैया आगे कैसा रहेगा? बोर्ड के सामने फैसले को लागू कराने की चुनौती होगी। वैसे ही जैसे तलाक देने वालों को बिरादरी से बाहर करने का उसका मॉडल बेनतीजा रहा है। यहां यह भी सवाल अभी खड़ा है कि ताकतवर तीन तलाकवादियों को दंडित करने का साहस कौन दिखाएगा? अब अदालत का हुक्म है तो भी इसके मनवाने में मुश्किल है। 

पहले बोर्ड ने भी फैसले के रिविजन पर विचार किया था, लेकिन यह ख्याल छोड़ दिया गया है। बोर्ड को इस मामले में महिलाओं से ही बड़ा डर था और है और उसका डर निराधार भी नहीं है। मुस्लिम महिलाओं के बड़े तबके में चौतरफा बदलाव की चाहत बढ़ी है। वह अपने धार्मिक मामलों में सरकार की दखल देने के बोर्ड के आरोपों से इत्तेफाक नहीं रख रही हैं। महिलाएं तो अब बोर्ड की महिला शाखा से भी वह सहमत नहीं जो इन कवायदों में सरकार और सत्ताधारी पार्टी का हस्तक्षेप मानती है। वह भी तब जब सरकार ने अदालती फैसले को काफी बताते हुए तलाक पर कानून बनाने से इनकार किया है। दरअसल मुस्लिम महिलाएं धार्मिक नियमों की अपनी बेहतरी के पक्ष में लामबंद होना चाहती हैं।

यह दृष्टि मजहब को महिलाओं के लिए बराबरी का समाज बनाने में भागीदार के रूप में देखती है। इसलिए ही बहुविवाह-जो तब की परिस्थितियों में वाजिब था-को अब के हालात में अपने हक में परेशानी  मानती हैं। वह हलाला निकाह से भी आजाद होना चाहती हैं। नई मुस्लिम महिलाएं अपने प्रति होने वाली नाइंसाफी से बचाव के लिए अदालती तलाक के पक्ष में लामबंद होती दिखती हैं। बोर्ड का यह आकलन सकारात्मक है कि इसके लिए नये दौर की जरूरी जागरूकता लानी होगी। तालीम के जरिये समुदाय की मानसिकता बदलनी होगी। भोपाल की जमीं पर हुए बोर्ड के फेसले से जागृति आती दिखती है और वर्तमान संवैधानिक ढाँचे से सीधी टकराहट से बचने की कोशिश भी।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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