नमामि गंगे से जनता को जोड़ना जरूरी

राकेश दुबे@प्रतिदिन। “नमामि गंगे” सरकारी योजना है, तो यह नहीं मान बैठना चाहिए कि आम नागरिक का कुछ कर्तव्य नहीं है। गंगा का स्वच्छ होना जितना केंद्रीय योजनाओं पर निर्भर है, शायद उतना ही जनता के जुड़ाव से भी है. नि:संदेह गंगा गलत नीतियों और लापरवाही की वजह से प्रदूषित हुई है। मगर अब वक्त संभलने का है। गंगा को स्वच्छ रखने की नरेन्द्र मोदी की सरकार की कोशिश अगर वाकई ईमानदार है, तो वह दिन दूर नहीं, जब गंगा पूरी तरह से साफ-सुथरी हो जाएगी। हालांकि यह सब 2018 यानी दो साल बाद ही हो पाएगा। दरअसल, गंगा सफाई को लेकर 1985 में जिस ‘गंगा एक्शन प्लान’ की शुरुआत की गई और जो 2014 तक कार्यरूप में रहा, उस पर चार हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं|इतनी विशाल राशि का एक नदी की सफाई पर खर्च किया जाना इसलिए आशंका पैदा करता है कि अभी भी यह नदी काफी प्रदूषित है. वैसे, अगले पांच सालों में करीब बीस हजार करोड़ रुपये गंगा सफाई पर खर्च करने की योजना है। सख्ती करने से गंगा की सफाई हो जाएगी, इस सोच में बदलाव लाने की भी जरूरत है।

सरकारी मशीनरी और नीति नियंताओं को यह बात भी भली-भांति सोचनी समझनी होगी कि इस महती योजना में हमें जनता को भी जोड़ना होगा। जनसहभागिता जरूरी है। जब तक यह नहीं किया जाएगा, गंगा को प्रदूषण से मुक्ति दिलाना नामुमकिन है; क्योंकि तकरीबन 50 करोड़ की आबादी गंगा किनारे बसती है और उनमें यह समझ विकसित करना सरकार के लिए भगीरथी प्रयास सरीखा ही होगा। यह भी जगजाहिर है कि गंगा में औद्योगिक कचरा डालने और सीवर ट्रीटमेंट के बाद पानी ने गंगा की पवित्रता को ज्यादा क्षति पहुंचाई है। इससे इतर, सफाई के मसले पर सियासत ने भी गंगा को साफ रखने के ध्येय को डगमगाया है।

संदेश साफ होने चाहिए कि राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मसलों पर राजनीति करना समझदारी नहीं है. चूंकि गंगा सिर्फ नदी नहीं हमारी आस्था का केंद्रबिंदु है। हमारी परंपरा और विचारबिंदु का चरम है। इस नाते, सिर्फ योजनाओं के सहारे नदी को पवित्र करने का संकल्प शुतुरमुर्गी चाल के अलावा कुछ भी नहीं है. हां, सरकार को यह भी समझना होगा कि गंगा को लेकर जनता की आस्था जिस तरह से है, उसका इस्तेमाल भी उसी तरीके से हो।
 श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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