हे ! बहुमत प्राप्त मोदी, कुछ कीजिये

Updesh Awasthee
राकेश दुबे@प्रतिदिन। गुजरात में आरक्षण के कारण मोबाईल और इंटरनेट पर अस्थायी तौर पर पाबंदी लगी हुई है , कारण आरक्षण |आरक्षण की व्यवस्था नेक इरादे से शुरू की गई थी। उन जातियों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जगह दिलवाने के लिए आरक्षण की नींव रखी गई थी, जिन पर सदियों से सवर्ण जातियों ने कथित  जुल्म ढाया था। उनके बच्चों से शिक्षा का अधिकार छीन लिया था,  लेकिन आज हालत यह है कि आरक्षण लड़ कर लेने की कोशिश वे लोग  कर रहे हैं, जोसच में ग्रामीण भारत के मालिक हैं। 

पटेलों से पहले इस तरह के प्रदर्शन किए हैं गूजर, जाट और मराठों ने, इसलिए कि बिना आरक्षण के न उनको सरकारी नौकरियां मिलती हैं आसानी से और न ही उनके बच्चों को शिक्षण संस्थाओं में दाखिला। सारा ढांचा ही उलट-पुलट हो गया है। इसको अगर कायम रखना है, तो नए नियम बनने चाहिए, जिनकी बुनियाद आर्थिक होनी चाहिए, जाति नहीं। ऐसा करना जरूरी हो गया है और अगर ये  प्रधानमंत्री नहीं कर पाते हैं, जो तीस साल बाद पूर्ण बहुमत लेकर आए हैं, तो कौन कर सकता है?

और अगर करने का प्रधान मंत्री ने सोचा  उनकी राह में उनके अपने ही आला अधिकारी दीवार बन कर खड़े हो जाएंगे, क्योंकि अगर एक शब्द है जिसको सुनते ही ये अधिकारी खौफ से कांपने लगते हैं, तो वह शब्द है परिवर्तन। राजनेता अगर हिम्मत से निर्णय करता है तो आला अफसर उसके सामने  अड़ जाते हैं | जब पीवी नरसिंह राव आर्थिक सुधार शुरू करने के वाले थे तो विदेश के बड़े उद्योगपतियों ने उनसे कहा था कि सरकारी अफसरों की अकड़ की वजह से वे भारत में निवेश करना पसंद नहीं करते हैं। 

नरसिंह राव ने   कहा था  कि ‘सर्कस के जानवरों’ का मिजाज होता है अधिकारियों का, सो रिंगमास्टर अगर चाबुक चला कर काम लेता है तो वे चुपचाप कर लेते हैं। कुछ बानगी  लाइसेंस राज हटाए जाने के खिलाफ इतना प्रचार हुआ कि कांग्रेस पार्टी अगला चुनाव हार गई। इसके बाद किसी भी प्रधानमंत्री की परिवर्तन की राह चलने की  हिम्मत नहीं हुई |पिछले लोकसभा चुनाव तक जनता ने  किसी भी प्रधानमंत्री को पूर्ण बहुमत नहीं दिया । मोदी ही हैं, जिनको पहला मौका मिला है तब के बाद कुछ करने का। शुरुआत उनको करनी चाहिए, शिक्षण संस्थानों से आरक्षण हटा कर।

श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com

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