महाराष्ट्र पंडरपुर मंदिर की तर्ज पर बना रहली में पंढरपुर मंदिर

Updesh Awasthee
योगेश सोनी। सागर जिले की रहली तहसील में स्थापित भगवान पंडरीनाथ का मंदिर किसी परिचय का मोहताज नही है। दौ सो पच्चीस साल पुराने मराठाकालीन मंदिर की ख्याति देश भर में फैली है। अषाड पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा पर देश के कोने कोने से भक्त दर्शन करने पहुंचते है। मध्य भारत और उत्तर भारत में रहने वाले मराठा समुदाय तथा अन्य धर्मप्रेमी जन के लिये यह क्षेत्र उसी तरह मान्य है जिस तरह महाराष्ट्र में स्थापित पंढरीनाथ मंदिर। पेश है एक रिपोर्ट

सुनार नदी के तट पर स्थामित भगवान पंढरीनाथ का मंदिर महाराष्ट्र में स्थापित पंढरीनाथ मंदिर की हूबहू प्रतिकृति है। इसका निर्माण 1790 में यहां के मराठाकालीन वंश की रानी द्वारा 37500 वर्गफृट में रथाकार स्वरुप में कराया गया था।

यहां पर हर साल मुख्य रुप से दो बार आयोजन होते है। अषाण पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा को भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें देश प्रदेश के कोने कोने से भक्त दर्शन करने पहुचते है।

मंदिर पुजारी अजित सपे्र के अनुसार भगवान पंढरीनाथ अपने भक्त की परीक्षा लेने आते है उस समय भक्त आपे माता पिता की सेवा में तल्लीन था कि भगवान प्रकट हो गये तो भक्त ने वही वैठै वैठै एक ईंट का टुकडा खिसका दिया कि अभी इस पर वैठ जाओं जब माता पिता की सेवा हो जायेगी तब आपका पूजन अर्चन करेंगे। भगवान कमर पर दोनो हाथ रखे भक्त का इंतजार करते रहै जब भक्त ने माता पिता की सेवा कर ली तब भगवान की पूजा की भगवान माता पिता की सेवा को पहले सर्वोपरि मानने वाले भक्त पर प्रसन्न हो गये और वरदान मांगने को कहा  तो भक्त द्वारा वही स्थापित होेने का वरदान मांगा इसिलिये आज भी भगवान श्री कृष्ण जिन्हे महराष्ट्र में बिठ्ठल कहा जाता है वे ईट पर अपने दोनों हाथ कमर पर रखे हुये भक्त के इंतजार की मुद्रा में विराजामन है। मराठी में ईंट को बीठ कहा जाता है ओर भगवान ईंट पर खडे हे इसिलिये विठ्ठल कहलाते है।
महाराष्ट्र में स्थापित पंढरीनाथ मंदिर की अनुकृति के लिये के लिये मराठो ने रहली को ही क्यो चुना इस संबंध में इतिहासकारों का मानना है कि मराठा सामा्रज्य पूरे भारत में फैलने के कारण मराठा परिवार देश के कोने कोने में फैल गये थे अब उत्तर से से दक्षिण (मराठों के मुख्य तीर्थ स्थल  महाराष्ट्र में स्थापित पंढरीनाथ मंदिर) पहुचने  में अनेक कठिनाईयां थी। और रहली में ही 300 से अधिक मराठा परिवार रहते थे जिनमें आज भी कुछ निवासरत है। अतः मराठों द्वारा अपने मुख्य तीर्थ की भांति एैसे स्थन की खोज की जहां वैसा ही प्राकृतिक वातावरण हो जहां नवीन स्थल की  का निर्माण कराया जा सके। रहली में सुनार नदी के तट पर यह खोज उपयुक्त मिलने पर मंदिर निर्माण वैसेी ही आकृति में कराया गया।महाराष्ट्र और रहली दोनों ही मंदिर दो नदियांे के संगम पर है और दोनों ही स्थानों पर नदिया चंद्राकार बहती है मराठा यही कारण रहा कि पंढरलपुर नाम से नगर बसाया गया और मंदिर का निर्माण किया गया।

इनपुट: योगेश सोनी रहली सागर म.प्र

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