जबलपुर। मप्र में 3000 ऐसे डॉक्टर हैं जिन्हे मानव अंगों की जानकारी तक नहीं है। उन्होंने ना तो किडनी देखी है और ना ही लीवर या ऐसे ही दूसरे अंग। सर्टिफिकेट मिल गया है, डॉक्टर बनकर इलाज भी कर रहे हैं।
डॉक्टर बनना है तो शरीर के अंदरूनी अंगों की जानकारी होना जरूरी है।एनाटॉमी विषय की पढ़ाई के साथ प्रेक्टिकल से होता ही इसीलिए है। इसे पास किए बिना कोई व्यक्ति डॉक्टर बन ही नहीं सकता लेकिन प्रदेश के आयुर्वेद कॉलेजों से अब तक लगभग 3 हजार ऐसे छात्र डॉक्टर बन गए हैं, जिन्होंने केडेबर (शव) पर प्रेक्टिकल ही नहीं किया। लिहाजा इन डॉक्टरों ने किडनी, लीवर सहित शरीर के अन्य अंदरूनी अंग देखे ही नहीं और न ही सर्जरी के बारे में मालूम है।
क्यों है जरूरी
शरीर के अंदरूनी अंग (आर्गन्स) की जानकारी के लिए बीएएमएस फर्स्ट ईयर में एनाटॉमी विषय छात्रों को पढ़ाया जाता है। इसके लिए एक प्रेक्टिकल सब्जेक्ट भी होता है, जिसमें केडेबर (शव) का डिसेक्शन करके शरीर के अंदर के अंगों (आर्गन्स) की जानकारी दी जाती है। इससे छात्रों को हर अंग की कार्यप्रणाली (फंक्शन) के बारे में पता चलता है।
ये है मापदंड
0 एक साल में 4 केडेबर या बॉडी का उपयोग होना चाहिए।
0 एक केडेबर में एक साथ 10 छात्र सीख सकते हैं।
0 एक बैच में 40 छात्र होते हैं।
अब तक ये हुआ
0 प्रदेश में कई कॉलेजों में वर्ष 2003 से 2008 तक अनुपात के अनुसार केडेबर या बॉडी ही नहीं थी।
0 शासकीय आयुर्वेद कॉलेजों में 2013 के बाद जीरो ईयर से स्थिति सुधरी।
0 इस दौरान लगभग 3000 छात्र पढ़कर निकल चुके और ये केडेबर पर डिसेक्शन नहीं कर पाए।
0 शासकीय आयुर्वेद कॉलेज जबलपुर और बुरहानपुर में स्थिति अभी भी जस की तस है।
0 आयुर्वेद अस्पताल जबलपुर में पिछले साल जीरो ईयर होने से बैच नहीं आया, लेकिन इसके पहले के बैच को उस बॉडी से डिसेक्शन सिखाया गया, जो छिन्न-भिन्न हो चुकी थी। जबकि नियमानुसार दो बॉडी कॉलेज में होना चाहिए।
ये फर्क पड़ेगा
बॉडी के अंदरूनी आर्गन्स या अंगों के बारे में जानकारी नहीं होने से कई आयुर्वेद छात्र जो कि अब डॉक्टर बन गए हैं, उन्हें शरीर के बारे में पता ही नहीं और वे मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
शासन की बेरुखी
शासन ने आयुर्वेद अस्पतालों को नजरअंदाज ही किया। इन अस्पतालों में इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरा नहीं होने से ये अस्पताल और कॉलेज हाशिये पर आ गए हैं। सेंट्रल कौंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन भी इनमें से कई कॉलेजों को अमान्य करने पर विचार कर रही है।
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प्रदेश के कई कॉलेजों से अब तक लगभग 3 हजार छात्र वर्ष 2008 तक ऐसे पास हो गए, जिन्होंने केडेबर का डिसेक्शन किया ही नहीं। वे शरीर के अंदरूनी अंगों के बारे में नहीं जानते और डॉक्टर बन गए। शासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए और कॉलेजों में केडेबर की व्यवस्था करानी चाहिए।
डॉ. राकेश पाण्डेय
पूर्व प्रांताध्यक्ष, आयुष

