नर्मदा मामले में सख्त हुआ हाईकोर्ट: सरकार को फटकार, समिति बनाई

Updesh Awasthee
जबलपुर। मध्यप्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा के अलावा गौर व परियट सहित अन्य नदियों में डेयरियों के कारण फैल रहे प्रदूषण के मामले में बुधवार को हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। इसी के साथ ओपन-कोर्ट में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा गया कि जब इंसान नदियां बना नहीं सकता, तो उसे उन्हें बिगाड़ने का क्या हक है?

मुख्य न्यायाधीश अजय माणिकराव खानविलकर व जस्टिस केके त्रिवेदी की युगलपीठ ने राज्य की ओर से पेश की गई रिपोर्ट को बेहद संक्षिप्त (स्कैची) निरुपित करते हुए बेहद गंभीर मामले में घोर लापरवाही का आरोप लगाया। इसी के साथ अविलंब संयुक्त बैठक आयोजित करने निर्देश दे दिया गया। इस बैठक में राज्य शासन व प्रशासन के प्रतिनिधि-अधिकारी, डेयरी संचालक, जनहित याचिकाकर्ता, पशुपालन विभाग और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारियों को शामिल करने कहा गया है। संयुक्त बैठक के जरिए समग्र रिपोर्ट और ठोस पॉलसी बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिसकी रिपोर्ट हर हाल में 14 मई तक पेश करने कहा गया है। ऐसा इसलिए ताकि समर वेकेशन से पूर्व इस मामले की अगली सुनवाई की जा सके।

जनहित याचिकाकर्ता का पक्ष
सुनवाई के दौरान जनहित याचिकाकर्ता नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के प्रांताध्यक्ष डॉ.पीजी नाजपांडे ने अपना पक्ष स्वयं रखा। जबकि समाजसेवी ग्लेन पाल की ओर से अधिवक्ता मनीष वर्मा खड़े हुए। डॉ.नाजपांडे ने दलील दी कि नीरी ने अपनी रिपोर्ट में महाराष्ट्र सरकार की मार्गदर्शिका का हवाला देते हुए मध्यप्रदेश में भी डेयरियों को नदियों व नेशनल हाइवे से दूरी 500 मीटर रखे जाने की सिफारिश की है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश शासन ने मनमाने तरीके से अपनी मार्गदर्शिका में यह दूरी महज 100 मीटर जितनी कम निर्धारित कर ली। यह कदम संशोधन के जरिए उठाया गया अतः और भी शर्मनाक है।

सोमवार को होगी बैठक
इस मामले में हाईकोर्ट की फटकार के बाद बाहर निकलते ही उपमहाधिवक्ता समदर्शी तिवारी, पशुपालन विभाग के भोपाल से आए अधिकारी और जनहित याचिकाकर्ताओं ने मिलकर सोमवार को संयुक्त बैठक करने का निर्णय लिया।

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